दुनिया सारी वेद बिना दुखिया भारी वेद बिना (धुन-मैने जीना सीख लिया)
दुनिया सारी वेद बिना,
दुखिया भारी वेद बिना,
आज विश्व में घर-घर अन्दर
आहो जारी वेद बिना।। टेक ।।
ऐसा कोई परिवार नहीं,
जिसमे है तकरार नहीं,
झूठ कपट छल दम्भ द्वेष से,
रहित कोई व्यवहार नहीं,
जिसको भी हमने देखा,
किसी से भी कम न देखा,
अपने गिरे विचारों पर,
अफसोस और गम न देखा,
ठग्गी धोखेबाजी को,
समझें होशियारी वेद बिना।।1।।
एक मर्ज की दवाई दें,
लेकिन चार दिखाई दे,
वैद्य की है तशकीश गलत फिर
किसको आज बुराई दें,
आग जड़ों पर बाल रहे,
पत्तों पर जल डाल रहे,
लक्ष पूर्ति हो कैसे जब
उल्टे राह पर चाल रहे
आज अविद्या की घरघर छाई
अंधियारी वेद बिना, ।।2।।
श्रद्धा और विश्वास नहीं,
बल बुद्धि और साहस नहीं,
इसीलिये तो आज विश्व के,
बचने की कोई आस नहीं,
शुद्ध खाना ना पीना है,
मौत में कोई कमी ना है,
जी तो रहे पर मरे हुए हैं,
किस जीने में जीना है,
नहीं आत्म विश्वास रहा,
बने भ्रष्टाचारी वेद बिना।।3।।
रक्षक भक्षक बन करके चले,
गर्व से तन करके, बाढ़ खेत को
खाने लगी है,
देखो जरा मनन करके,
धर्म कर्म और ईश भजन में
नहीं आज किसी का मन,
आज का मानव मानवतातज,
कहता फिरे हाय धन हाय धन,
शोभाराम प्रेमी जन-जन को है
बेकरारी वेद बिना ।।4।।










