दो-२ चोटी राख बड़ी इतराती है (तर्ज – रेशमी शलवार)
दो-२ चोटी राख बड़ी इतराती है,
मूंड फकेरे चले, नहीं शरमाती है।
थोडी इंगलिश पढ़ जावें,
तो चश्मा आँख चढ़ावें।
नहीं काम से हाथ लगावें,
कुछ कहे तो चार सुनावें ।।
आँख दिखलाती है।। दो-२
चोटी० अब रहा न ठौर ठिकाना,
सब तज दिया भेष पुराना।
गीतों का करें बहाना गाती है
फिल्मी गाना ।।
कमर मटकाती है।। दो-२
चोटी० मोटा कपड़ा नहीं भावै,
पहनें तो तन छिल जावै।
नाईलोन की साड़ी सुहावै,
जिसमें कुल बदन दिखावै ।।
लाज गवाती है।।। दो-२ चोटी०
घर भोजन नहीं बनावें,
सीधी होटल को जावें।
वहाँ बिस्कुट चाय उड़ावें,
गैरों से हाथ मिलावें ।।
धर्म गंवाती है।। दो-२ चोटी०










