दो दिन के मिले इस नरतन में,कुछ खोया है कुछ पाया है
तर्ज: दो दिन की मुहब्बत में हमने
दो दिन के मिले इस नरतन में,कुछ खोया है कुछ पाया है
किसने ईश्वर को समझा है, किसने जीवन ही गँवाया है ॥
दो दिन….
किसने माया को थाम लिया और स्वार्थ से ही काम लिया।
कोईजाना प्रभु को मन से और कर्म सदा निष्काम किया ॥
विषयों में उलझा ही रहा कोई शरण प्रभु की आया है ॥
दो दिन..
कोई दुःख देकर आघात करे और दुखती रंग पर हाथ धरे ।
कोई परहित की चिन्ता ही करे दुःखियों के दर्द में पीर हरे ।
कोई रो रो जीवन काट रहा, कोई हँसा है जग को हँसाया है ॥
दो दिन….
कोई क्रोध द्वेष में ढलता रहा सबकी नजरों में खलता रहा
कोई प्रेम दया में पलता रहा और सबके दिलों में रमता रहा
किसने निज मन को जलाया है और किसने मान बढ़ाया है ॥
दो दिन….
जिसने दुर्गुण को छोड़ दिया सद्गुण से नाता जोड़ लिया
मन उत्तम कर्म में मोड़ लिया और ज्ञान से धर्म की ओर गया
जिसने निज लक्ष की खोज लिया उसने ये जन्म बचाया है ॥
दो दिन….
संसार को जिसने जान लिया वर्चस्व प्रभु का मान लिया
जीवन में त्याग को स्थान दिया सर्वस्व प्रभुका जान लिया
प्रभु का प्रभु को अर्पण कर दे उसने प्रभु प्रीतम पाया है ॥
दो दिन….
(रग) शरीर की नस (वर्चस्व) महत्ता, शक्ति










