सिंह॑ः पावकाः प्रति॑ता अभूवन्त्स्व॒स्ति नंः पिपृहि पारमा॑साम् ।
इन्द्र त्वं र॑थि॒रः पाहि नो र॒िषो म॒क्षूम॑क्षू कृणुहि गोजिततो॑ नः
॥ ऋ. ३.३१.२०
तर्जः मनमे मनमे तड़मारम मन मे
बरसे बरसे, मेघा बरसे
ताल तलैया, सरोवर सरसे
प्रचण्ड ताप से तपित हुए थे
तरसी-धरणी अब सरसाई, हे आनन्द वर्षे !
जल फैला जीवनदायी, मस्ती मनभाये ॥
॥ बरसे बरसे ॥
बाह्य वर्षायें सिर्फ तुम नहीं बरसाते
आन्तरिक वर्षाओं से भी मन सरसाते
उग्र पाप के तापों से सिर्फ तुम ही बचाते
दयित पात्र तुम अपना हम भक्तों को बनाते
सद्गुणों की वर्षा से स्नात हो रहा हृदय
बरसी फुहार अन्तस्ताप हो गये विलय
बुद्धि आत्मा मन इन्द्रिय हो रही हैं सिक्त
आनन्दधन तेरी वर्षा ने किया हमें परितृप्त
ये दिव्य वर्षा, चरमोत्कर्ष पे,
पहुँचा के, हमें दर्श दे
बरसे ये बरसे, भूरि भूरि बरसे ॥
॥ बरसे बरसे ॥
इधर मैं तुम्हारे द्वारा गुणानन्द वर्षा से
बार बार पुलकित मन से बैठा निश्चिन्तता से
उधर अघशंस-सेना घेरती अधमता से
कर रही हिंसक तैयारी अपनी वार खलता से
इन्द्र हमको तुम ही बचा सकोगे
रथ हीन अभारी हम, तुम वीर अनोखे
बाण अघ के अगणित कैसे सहेंगे?
तेरे स्थिर रथ पे बैठ शरण तेरी लेंगे,
पाप जनित हिंसा से उबार लो
विजित चक्रवर्ती का अनघ स्वराज्य दो
बरसे रक्षण हम पर बरसे।
॥ बरसे बरसे ॥
आन्तरिक साम्राज्य में यदि विद्रोह मच गया हो
बाह्य चक्रवर्ती बनके क्यों कर भला हो,
आन्तरिक मनोरथ-सिद्धि ‘इन्द्र’ आके तुम करो
उच्चतर आध्यात्म-क्षेत्र पे विजय मेरे हस्त धरो
उच्चतम सुक्षेत्र हृदय में निर्वासित रहो
पाप पापियों को हमसे दूर करो,
दुवन द्वेषियों से हे इन्द्र! बचा लो,
दिव्य शक्ति-दाता शक्ति देके सम्भालो
पूर्ण करो हम सबकी प्रार्थना,
अब हम ना चाहें अघ-यातना
बरसा दे आत्मशक्ति, हार्दिक स्नेह दे॥
॥ बरसे बरसे ॥
(धरणी) घरती। (दयित) प्यारा। (स्नात) नहाया हुआ। (अन्तस्ताप) आन्तरिक दुख।
(भूरि-भूरि) अधिक। (अनय) विन पाप का। (अघ) पाप। (सिक्त) भीगा हुआ। (परितृप्त)
अच्छी तरह संतुष्ट। (चरमोत्कर्ष) अत्यन्त ऊँचाई तक। (गुणानन्द) गुणों से भरा हुआ
आनन्द। (पुल्कित) खिला हुआ। (अथशंस) हिंसक पाप की। (खलता) नीचता










