दिनेश चंद्र गुप्त:

0
155

राइटर्स बिल्डिंग हमला (8 दिसंबर 1930) – जब तीन क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार को दहला दिया

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई घटनाएँ ऐसी हुईं जिन्होंने ब्रिटिश सरकार की नींव हिलाकर रख दी। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण घटना थी 8 दिसंबर 1930 को हुई राइटर्स बिल्डिंग पर क्रांतिकारी हमला। इस हमले का उद्देश्य केवल एक अधिकारी को मारना नहीं था, बल्कि यह अंग्रेजी शासन के प्रति एक तीव्र संदेश था कि भारतीय स्वतंत्रता सेनानी अपने देशवासियों पर हो रहे अत्याचारों को सहन नहीं करेंगे। इस ऐतिहासिक घटना को अंजाम देने वाले तीन युवा क्रांतिकारी थे—दिनेश चंद्र गुप्त, विनय बसु और बादल गुप्ता

विनय बसु,बदल गुप्ता,दिनेश चंद्र गुप्त

पृष्ठभूमि: क्रांतिकारी संगठन और उद्देश्य

1920 और 1930 के दशक में भारत के क्रांतिकारी आंदोलनों ने नई ऊर्जा ग्रहण की। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, सूर्य सेन और अन्य क्रांतिकारियों की प्रेरणा से युवा भारत स्वतंत्रता की ज्योत जलाने के लिए तैयार था। ‘बंगाल वोलंटियर्स’ नामक क्रांतिकारी संगठन, जिसका नेतृत्व सतीश चंद्र बोस कर रहे थे, ने अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारियों पर हमले करने और उन्हें भयभीत करने की योजना बनाई।

ब्रिटिश जेलों में भारतीय कैदियों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ प्रिजन, एन.एस. सिम्पसन को मारने का निर्णय लिया गया। वह अपनी क्रूरता और भारतीय कैदियों पर किए गए अमानवीय अत्याचारों के लिए कुख्यात था।


8 दिसंबर 1930 को दिनेश चंद्र गुप्त, विनय बसु और बादल गुप्ता यूरोपियन वेशभूषा में कोलकाता के डलहौजी स्क्वायर स्थित राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश कर गए। उन्होंने सिम्पसन को ढूँढा और जैसे ही वे उनके करीब पहुँचे, उन्होंने उस पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चला दीं, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

ब्रिटिश पुलिस ने तुरंत जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। राइटर्स बिल्डिंग में मौजूद अन्य अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के साथ इन तीनों क्रांतिकारियों की मुठभेड़ शुरू हो गई। कई अधिकारी गंभीर रूप से घायल हुए।

हालांकि, ब्रिटिश पुलिस की संख्या अधिक थी और वे तीनों युवा क्रांतिकारी धीरे-धीरे घिरने लगे। वे किसी भी हाल में गिरफ्तार नहीं होना चाहते थे। जब भागने का कोई रास्ता नहीं बचा, तो उन्होंने वीरता का परिचय देते हुए अलग-अलग तरीके अपनाए—

  • बादल गुप्ता ने पोटेशियम साइनाइड खा लिया और वहीं शहीद हो गए।
  • विनय बसु और दिनेश चंद्र गुप्त ने अपनी ही रिवॉल्वर से खुद को गोली मार ली।

विनय और दिनेश को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया।


क्रांतिकारियों का बलिदान

  • 13 दिसंबर 1930 को विनय बसु की अस्पताल में मृत्यु हो गई।
  • दिनेश चंद्र गुप्त बच गए, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन पर मुकदमा चलाया और 7 जुलाई 1931 को अलीपुर जेल में उन्हें 19 वर्ष की आयु में फाँसी दे दी गई

इन तीनों क्रांतिकारियों का बलिदान बंगाल और पूरे भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के लिए प्रेरणास्रोत बन गया।


इन तीनों क्रांतिकारियों की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए डलहौजी स्क्वायर का नाम बदलकर ‘बी.बी.डी. बाग़’ (बिनय, बादल, दिनेश) कर दिया गया। यह स्थान आज भी कोलकाता के ऐतिहासिक स्थलों में से एक है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली अतीत की गवाही देता है।


निष्कर्ष

8 दिसंबर 1930 को हुआ राइटर्स बिल्डिंग हमला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति की मशाल जलाने वाली घटनाओं में से एक था। दिनेश, विनय और बादल ने अपनी शहादत से ब्रिटिश सरकार को बता दिया कि भारत अब दासता की बेड़ियों में जकड़ा नहीं रहेगा।

इन वीरों का बलिदान हर भारतीय को अपने देश के लिए समर्पण और बलिदान की भावना सिखाता है। आज भी उनकी वीरता हमें स्वतंत्रता के महत्व को समझने और अपनी मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देती है।

शत शत नमन उन वीर हुतात्माओं को!

8 दिसम्बर का दिन भारतमाता को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने के अपने प्रयासों के तहत क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजी सरकार के मन में दहशत उत्पन्न करने के लिए कलकत्ता के डलहौजी स्क्यूयर में स्थित सेकेट्रीएट बिल्डिंग राइटर्स बिल्डिंग पर किये गए हमले को याद करने का दिन है|

8 दिसंबर 1930 को यूरोपियन लिबास में तीन युवा क्रांतिकारी दिनेश चन्द्र गुप्त, विनय बसु और बादल गुप्ता कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश कर गए और जेलों में भारतीय कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ़ प्रिजन एन.एस. सिप्सन को मार गिराया|

फिर क्या था, ब्रिटिश पुलिस और तीन युवा क्रांतिकारियों में गोलीबारी शुरू हो गयी जिसमें कई अन्य अधिकारी भी गंभीर रूप से घायल हुए| लम्बे संघर्ष के बाद पुलिस उन पर हावी होने लगी| गिरफ्तार ना होने की इच्छा के चलते बादल गुप्ता ने पोटेशियम साइनाइड खा लिया और मृत्यु का वरण किया जबकि विनय और दिनेश ने अपनी ही रिवाल्वार्स से खुद को गोली मार ली|

दोनों को अस्पताल ले जाया गया जहाँ विनय की 13 दिसंबर 1930 को मृत्यु हो गयी पर दिनेश को बचा लिया गया| उन पर मुकदमा चला कर उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी और 7 जुलाई 1931 को 19 वर्ष की आयु में उन्हें अलीपुर जेल में फांसी दे दी गयी|

इन तीनों की शहादत ने कितने ही दिलों को झझकोरा और क्रांति का ये कारवां आगे बढ़ता गया| स्वतंत्रता के बाद दिनेश, विनय और बादल की स्मृति को अक्षुण रखने के लिए डलहौजी स्क्यूयर का नाम बदल कर इनके नाम पार कर दिया गया और आज इसे बी.बी.डी.बाग़ कहा जाता है। इन हुतात्माओं को शत शत नमन।