दिन कहीं पे है तो कहीं रात है, अन्धकार है कहीं प्रकाश है ॥
तर्ज : तुम हो साथ रात भी
दिन कहीं पे है तो कहीं रात है, अन्धकार है कहीं प्रकाश है ॥
पेड़ फूल फल जमीं पे हैं खिले, झूमझूम नदी सागर से मिले
जहाँ देखों वही पर बहार है,
हर शे का रंग कहीं भी कम नहीं है ॥ दिन कहीं…
सूर्य चन्द्र तारों के दीप जले, पवन बहे संग मधुर गीत चले
धरती गगन दोनों गले मिलें, जो स्वर्ग है कुदरत का वो यहीं है
कितना खुशनसीब ये जहान है, वो रहा सदा प्रकाशमान है
ऐसा कारीगर के सब हैरान हैं ये सृष्टि काव्य जिसका वो कवि है ॥ दिन कहीं…
जहाँ देखो प्रभु का दीदार है, उसके कर्म में परोपकार है
सच्चे भक्त का वो तारनहार है
अपने भक्त की सदा सुनी है ॥ दिन कहीं..
(काव्य) कविता (कुदरत) प्रकृति










