दिलों की तह में ऋषि अपनी याद छोड़ गए

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दिलों की तह में ऋषि अपनी याद छोड़ गए

तर्ज : मेरे लिए वो गये इन्तजार

दिलों की तह में ऋषि अपनी याद छोड़ गए

गए तो ऐसी अनोखी बहार छोड़ गए ॥

जुबाँ से कुछ न कहा अपने दुःख के बारे में

पराए दुःख में ऋषि सुख का साथ छोड़ गए ॥ गए तो….

हजारों कष्ट भी ऋषि के कदम पलट ना सके

धरम पे चलते कदम त्याग तप की ओर बढ़े ॥ गए तो….

उधर अधर्म इधर महर्षि अकेला था

ऋषि के सत्य के आगे अधर्मी दौड़ गए ॥ गए तो….

इसी ख्याल से ऋषि ने बनाया आर्य समाज

हरेक आर्य को वैदिक धर्म से जोड़ गए ॥

ऋषि को विष में भी अमृत दया के छूट दीखे

घातक की बेड़ियाँ अपनी दया से तोड़ गए ॥ गए तो !!

दया थी दिल में हँसी मुख पे जाँ सफर पर थी

‘प्रभु की इच्छा’ थी प्रभु से वो नाता जोड़ गए ॥ गए तो !!