धरती की शान, तू है मनु की सन्तान।
धरती की शान,
तू है मनु की सन्तान।
तेरी मुड्डियों में बन्द तूफान है रेऽऽ
मनुष्य तू बड़ा महान् है-भूल मत।
धरती-सा धीर तू है
अग्नि-सा वीर,
अरे तू जो चाहे काल
को भी थाम ले।
पापों का प्रलय रुके,
पशुता का शीश झुके,
तू जो अगर हिम्मत से काम ले।
गुरु-सा मतिमाऽऽऽऽन्,
गुरु-सा मतिमान् पवन-सा
तू गतिमान्।
तेरी नभ से भी ऊँची
उड़ान है रे ऽ मनुष्य तू….।
तू जो चाहे पर्वत
पहाड़ों को फोड़ दे,
तू जो चाहे नदियों के
मुख को भी मोड़ दे।
तू जो चाहे माटी से
अमृत निचोड़ दे,
तू जो चाहे धरती से
अम्बर को जोड़ दे।
अमर तेरे प्राऽऽऽण,
अमर तेरे प्राण मिला
तुझको वरदान।
तेरी आत्मा में स्वयं भगवान् हैं रे ऽ
मनुष्य तू….।
नैनों में ज्वाल,
तेरी गति में भूचाल,
तेरी छाती में छिपा
महाकाल है।
धरती के लाल,
तेरा हिमगिरि-सा भाल,
तेरी भृकुटी में ताण्डव
का ताल है।
निज को तू जाऽऽऽऽन,
निज को तू जान जरा
शक्ति पहचान।
तेरी वाणी में युग का
आह्वान है रे ऽ मनुष्य तू…।










