“यह जीवन धर्म के लिए है – अन्याय के सामने मौन रहना संन्यास नहीं कायरता है!”
जब भाग्यनगर (हैदराबाद) में अत्याचारों की आंधी चल रही थी, जब सत्याग्रहियों की टोली हर ओर धर्म की मशाल लिए आगे बढ़ रही थी – तब एक वृद्ध, वैराग्य से पूर्ण, ओजस्वी आर्य संन्यासी ने अपने जीवन का अंतिम उद्देश्य चुन लिया:
मैं धर्म के लिए जन्मा हूँ, अब समय आ गया है कि धर्म के लिए मृत्यु को भी अपनाऊं।”
यह विचार ही स्वामी कल्याणानन्द जी को सत्याग्रह के पथ पर ले गया – और उन्होंने आत्मबलिदान देकर अपने नाम को आर्य समाज के इतिहास में अमर कर दिया।
🏡 जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
जन्म: सन् 1874 ई.
स्थान: ग्राम किनौनी, डाकखाना बघरा, जिला मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)
पिता: चौधरी शाहमलसिंह
माता: श्रीमती सुजानकौर
जाति: जाट
भाई: लब्जाराम, घासीराम, भरतसिंह (बड़े), कन्हैयासिंह (छोटे)
📚 प्रारंभिक शिक्षा और संघर्ष
प्रारंभिक शिक्षा का कोई विशेष प्रबन्ध नहीं था।16 वर्ष की आयु में पढ़ाई प्रारंभ की।सन् 1898 में चौथी कक्षा उत्तीर्ण की।बाद में मिडिल परीक्षा पास की और कुछ समय पटवारी बनने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे।कई स्थानों पर नौकरी, कृषिकर्म, और फिर शिक्षक बने।1903 में हरसौली में स्थायी अध्यापक नियुक्त हुए।
🌼 वैदिक धर्म और प्रचार यात्रा
हरसौली में वैदिक धर्म का प्रभाव बढ़ा और उन्होंने आर्य समाज की दीक्षा ली।नियमित यज्ञोपवीत, संघ्या, और वेदाध्ययन शुरू किया।धीरे-धीरे प्रचार के प्रति रुचि जागृत हुई और उन्होंने अध्यापक पद से त्यागपत्र देकर पूर्णकालिक प्रचारक का जीवन चुना।गुरुकुल बदायूं, सिकंदराबाद और जाट क्षत्रिय सभा में प्रचारक के रूप में कार्य किया।
👨👩👧👦 पारिवारिक जीवन
उनकी धर्मपत्नी का देहांत लगभग 40 वर्ष की आयु में हो गया।उनके चार संतानें थीं – दो पुत्र, दो कन्याएं।पुत्र: रणजीतसिंह (बाद में सेना में भर्ती हुए और वहीं मृत्यु हुई),कन्याएं: भगवान देई, खजानी
🕉 संन्यास और तपस्वी जीवन
हरिद्वार के कुंभ में वैराग्य तीव्र हुआ। मायापुर में स्वामी ओंकार सच्चिदानन्द जी से संन्यास दीक्षा ली। दीक्षा के पश्चात् पंजाब, मेरठ, बुलंदशहर, सहारनपुर आदि जिलों में वेद प्रचार और स्त्री शिक्षा हेतु अद्भुत सेवा की।वे सच्चे संन्यासी थे – सदाचारी, सत्यवादी, और नियमित यज्ञकर्ता।
⚔ सत्याग्रह और बलिदान
जब हैदराबाद सत्याग्रह की लहर उठी, उन्होंने संन्यासी होकर भी कहा:
“धर्मयुद्ध में संन्यासी का मौन रहना अधर्म है।”
जत्था बनाकर वे शोलापुर पहुँचे।वहीं से लवर्गा में सत्याग्रह किया और गिरफ्तार हुए।जेल में उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं।वृद्धावस्था (75 वर्ष) और रोग ने उन्हें दुर्बल किया।8 जुलाई 1939 को चञ्चलगुडा जेल में उनका बलिदान हुआ।
🔥 अंत्येष्टि और सरकारी उपेक्षा
जेल प्रशासन ने मृत्यु छिपाने का प्रयास किया।10 जुलाई को औपचारिक घोषणा हुई लेकिन मृत्यु का कारण नहीं बताया गया।शव सत्याग्रहियों को सौंपा गया। उन्होंने वैदिक मंत्रों के साथ अंतिम संस्कार किया।
📖 रचनात्मक योगदान
स्वामी जी ने भजन संग्रह तैयार किए थे।
उनके भजनों में वैराग्य, वीरता और वेद का संदेश झलकता है।
जीवनभर प्रचार, शिक्षा और संगठन में लीन रहे।
🌺 श्रद्धांजलि संदेश
स्वामी कल्याणानन्द जी एक ऐसे तपस्वी संन्यासी थे जिन्होंने केवल प्रचार नहीं किया – अपने प्राणों की आहुति देकर धर्म की रक्षा की।










