“नित्यं संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः।”
(मृत्यु सदा समीप है, इसलिए सच्चा जीवन वही है जो धर्म की रक्षा में व्यतीत हो।)
🌾 जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
श्री अशर्फीलाल जी बिहार प्रांत के चम्पारण जिले के नरकटियागंज के निवासी थे। वे अपने परिवार के स्तंभ, वृद्ध पिता की लाठी और पूरे परिवार के प्राण थे। आर्थिक दृष्टि से परिवार सम्पन्न नहीं था, किंतु वे हृदय के धनी और दैवी गुणों से परिपूर्ण थे।
18 वर्ष की अल्पायु में भी उनमें असाधारण धार्मिक चेतना, साहस, और कर्तव्यनिष्ठा थी। धर्म के प्रति उनका अनुराग जन्मजात था या कठोर साधना से उपार्जित — यह कहना कठिन है, पर उनकी निष्ठा निर्विवाद थी।
🔥 हैदराबाद सत्याग्रह में भागीदारी
सन 1938-39 में हैदराबाद (निज़ाम) का धर्मयुद्ध आर्यसमाज के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन गया।
देश के कोने-कोने से सत्याग्रही “वैदिक धर्म की जय!” के घोष के साथ निजामशाही के अत्याचारों के विरुद्ध कूच कर रहे थे। यह धर्म, मान और स्वाभिमान की रक्षा का संग्राम था।
इसी पुकार ने अशर्फीलाल जी को भी खींच लिया। उन्होंने विलखती माँ, नवविवाहिता पत्नी, और गरीब परिवार का मोह त्यागकर धर्मयुद्ध में भाग लेने का संकल्प किया। यह त्याग केवल एक सच्चे कर्मयोगी का ही हो सकता है।
🕯 जेल यात्रा और बलिदान
22 मार्च को वे सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार हुए और जेल भेज दिए गए। वहाँ उन्हें कठोर यातनाएँ दी गईं। न जेल का भोजन अनुकूल था, न जलवायु।
बीमार होने पर भी उनसे माफी माँगने का दबाव डाला गया, लेकिन वे अडिग रहे। न तो कष्ट, न भय, न प्रलोभन— कुछ भी उनके निश्चय को डिगा न सका।
अंततः 15 अगस्त 1939 को वे जेल से रिहा तो हुए, लेकिन उनका शरीर पहले ही क्षीण हो चुका था।
19 अगस्त 1939 को यह वीर आत्मा अपने नश्वर शरीर को त्यागकर, धर्म और राष्ट्र की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर अमर हो गई।
🕊 स्मृति और आदर्श
श्री अशर्फीलाल जी अल्पायु में ही त्याग, वीरता और आदर्श का ऐसा दीपक जलाकर चले गए, जिसकी ज्योति आज भी प्रेरणा देती है।
उनका जीवन बताता है कि सच्चा बलिदान केवल युद्धभूमि में नहीं, कर्तव्यभूमि में होता है।
उनके निधन के बाद सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली द्वारा उनके परिवार को आर्थिक सहायता दी गई, किंतु कुछ समय बाद परिवार ने स्वाभिमानवश वह सहायता लेना बंद कर दी। यह उनके संस्कारों और आत्मबल का परिचायक है।
🙏 निष्कर्ष
अशर्फीलाल जी,
तुम्हारा जीवन त्याग, निष्ठा और आर्यत्व का जीवंत प्रतीक है।
तुम्हारी स्मृति राष्ट्रधर्मियों के हृदय में सदा अमर रहेगी।










