“समर्थो नोपकारी चेत्तस्यापि जननेन किम्”
(जो समर्थ होकर भी दूसरों की सहायता न करे, उसका जन्म व्यर्थ है।)
जन्मभूमि और कार्यक्षेत्र
स्थान: अकोलगाँ सय्यदां, निजाम राज्य
उम्र: केवल २५ वर्ष में धर्म हेतु बलिदान
निजामशाही की कठोर और हिन्दू विरोधी भूमि पर यह तेजस्वी नवयुवक धर्म-प्रसार का दीपक जलाने निकला। साकोल आर्यसमाज के सत्संगों से प्रभावित होकर वह वैदिक धर्म का प्रचारक बन गया। ऋषि दयानन्द के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की लगन उसमें प्रबल थी।
प्रचारक से प्रेरणास्रोत तक
महादेव का चेहरा तेज से दीप्त था। उसकी वाणी में प्रभाव और हृदय में करुणा थी। वह जहाँ भी जाता, लोग उसकी बातों से प्रभावित होते। विशेषतः अकोलगाँ उसका मुख्य प्रचार क्षेत्र बना। लेकिन यही कार्य कुछ लोगों को सहन नहीं हुआ। मुस्लिम कट्टरपंथियों को जब लगा कि महादेव का प्रचार उनके स्वार्थों को चोट पहुँचा रहा है, तब वे षड्यंत्र में लग गये।
बलिदान की अमर कथा
महादेव पर पहले भी कई बार प्राणघातक हमले हुए, पर वह हर बार बचता रहा। परंतु अन्ततः १४ जुलाई १९३८ को, जब वे प्रचार हेतु जा रहे थे, एक व्यक्ति ने पीछे से छुरा घोंपकर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार धर्म की राह पर चलते हुए उन्होंने अपने जीवन की आहुति दे दी।
श्रद्धांजलि
धर्मवीर महादेव जी ने अल्पायु में जो साहस, प्रचार और आत्मत्याग का आदर्श प्रस्तुत किया — वह आज भी हमें सत्य और वैदिक धर्म के प्रचार हेतु प्रेरित करता है।”धर्म के लिए जीना तप है, और धर्म के लिए मरना यज्ञ है।”










