धर्मी” द्वीप सप्त होते हैं, उनको भी तुम याद करो।

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धर्मी” द्वीप सप्त होते हैं, उनको भी तुम याद करो।

धर्मी” द्वीप सप्त होते हैं,
उनको भी तुम याद करो।
प्रथम कुश, और क्रौंच दूसरा,
व्यर्थ का ना तुम विवाद करो।
तीजा शाक, शालमली चौथा,
उच्च स्वरों से नाद करो।
पुष्कर, प्लक्ष, सातवां जम्बू,
गिन पूरी तादाद करो। (1)

“धर्मवीर” तुम ध्यानपूर्वक,
नव खण्डों के नाम सुनो।
कुरुक्षेत्र, और भरत तीसरा,
सभी पुरुष और वाम सुनो।
ईलाव्रत है चौथा, और
भद्राश्व नाम सुखधाम सुनो।
केतुमाल, किमपुरुष, हिरणमय,
रम्यक नाम तमाम सुनो। (2)

चार लाख बत्तीस सहस्त्र का,
कलियुग समय कहाया है।
इससे पीछे दूना द्वापर,
पीछे कलियुग आया है।
कलियुग से त्रेता का भी,
तिगुणा समय बताया है।
“धर्मी” कलियुग काल से सतयुग,
चार गुणा कहलाया है। (3)

“धर्मी” प्यार से जो पलता है,
वह बालक ना मोटा हो।
जिस लड़के का बाप नहीं,
वह लड़का निश्चय खोटा हो।
प्यार नहीं परिवार में होता,
जिस घर अंदर टोटा हो।
शत्रु नहीं निकट में आवे,
जिसके “कर” में सोटा हो। (4)