भारत में चार्वाक, जैन, बौद्ध, तान्त्रिक, पौराणिक आदि नाना अवैदिक मतों के प्रचलन से वेद विद्या का शनैः शनैः लोप हो ही रहा था। विदेशों में उत्पन्न विमतों के अनुयायी जब इस देश के स्वामी बन गये तो राज्य-शक्ति के सहारे न केवल इस देश के वासियों को स्वधर्म से च्युत करने लगे, वरन् उनके मूल ग्रन्थों को भी अग्निदेव के अर्पण करने लगे ।
किन्तु भारत का आत्मा कभी भी सर्वथा प्रसुप्त नहीं हुआ था, वह समय-समय पर अङ्गड़ाई ले ही लेता था । ऐसे समय में कि जब वेद तथा तदनुकूल धर्म-ग्रन्थों एवं संस्कृति के साधनों का निर्दयता और बर्बरता से ध्वंस किया जा रहा था, आर्यों ने कहीं एकस्थ होकर एक योजना बनाई । कुछ ब्राह्मण परिवारों ने प्रण किया कि हम चारों वेदों को उनके सहायक ग्रन्थों के साथ कण्ठाग्र करके, रक्षा करेंगे, वे चतुर्वेदी कहलाये । कुछ ने किन्हीं तीन वेदों की रक्षा का भार ग्रहण किया, रक्षा का प्रकार पूर्वोक्त ही था । वे त्रिवेदी कहलाये । किन्हीं ने दो वेदों के रक्षण का उत्तरदायित्व लिया, वे द्विवेदी कहलाये । किन्होंने केवल एक वेद का संरक्षण स्वीकार किया, व वेदी कहलाये । संस्कृति के इस रक्षण सम्बन्धी पुण्य कार्य में केवल ब्राह्मणों ने ही भाग नहीं लिया, वरन् इतर वर्णों ने भी इसमें सहयोग दिया । क्षत्रियों में आज तक बेदी ज़ात इसका प्रमाण है ।
वेदों के साथ शाखाओं एवं ब्राह्मणादि ग्रन्थों की रक्षा की योजना भी की गई। ब्राह्मणों में चारायणशास्त्रीय, शाकल- शाखीय आदि वर्ग इस के साक्षी हैं।
वेदों की रक्षा में तो ब्राह्मणों ने पराकाष्ठा का कौशल दिखलाया । उनकी इस निपुणता तथा चतुरतामयी तत्परता का यह परिणाम है कि वेद के घोर विरोधी पाश्चात्य वेदानुशीलन कर्त्ताओं को भी यह कहना पड़ा कि वेद आज से तीन सहस्र वर्ष पूर्व जैसे थे, वैसे ही आज भी हैं। ब्राह्मणों ने उसकी रक्षा के लिए जो उपाय किये, उनमें से एक पाठ प्रकार उपाय था । यह एक ऐसा कवच उस समय के ब्राह्मणों ने निर्माण किया था, जो सर्वदा सर्वथा अजय्य बना रहा । उसके स्वरूप का दिग्दर्शन कराना आवश्यक है ।
जिस रूप में आज वेद मुद्रित अथवा अमुद्रित मिलते हैं । ‘उसका नाम संहितापाठ है। इसमें पदच्छेद नहीं है । पदच्छेद करके एक-एक पद को पृथक्-पृथक् पढ़ना और यथासंभव समस्त अथवा सन्दिग्ध पद का अवग्रह भी करना पदपाठ कहलाता है । क्रमवार एक विशेष शैली से पदों को रखना क्रमपाठ कहलाता है ।
इन तीनों पाठों के उदाहरण देकर अगले पाठों के नाम तथा उदाहरण देने उचित होंगे ।

१. संहितापाठ
औषधयः संवदन्ते सोमेन सहराज्ञा ।
यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि (ऋ १०/९०।२१)
२. पदपाठ
औषधयः । सम् । वदन्ते । सोमेन । सह । राज्ञा । यस्मै । कृणोति । ब्राह्मणः । तम् । राजन् । पारयामसि ।
वेद के विद्वानों का कथन है कि पदपाठ वेद का सबसे पुराना भाष्य है । प्रत्येक पद को पृथक्-पृथक् भाव समझने में सुविधा होती है ।
३. क्रमपाठ
औषधयः सम् । सम् वदन्ते । वदन्ते सोमेन ।
सोमेन सह । सह राज्ञा ।
राज्ञेति राज्ञा । यस्मै कृणोति । कृणोति ब्राह्मणः ।
ब्राह्मणस्तम् । तं राजन् ।
राजन् पारयामसि । पारयामसीति पारयामसि ||
इस पर ध्यान दीजिये । दो-दो पद मिला कर पढ़े जाते हैं। पहला- दूसरा, फिर दूसरा-तीसरा, पुनः तीसरा- चौथा, इसी प्रकार पहले के साथ अगला मिला कर पढ़ा जाता है । हाँ पूर्वार्ध के अन्तिम पद को एक वार पूर्वपद के साथ पढ़ कर पुनः उसके साथ इति लगाकर फिर उसे पढ़ा जाता है । जैसा कि इसी मन्त्र में ‘राज्ञा’ पद पूर्वार्ध का अन्तिम है । इसको इससे पूर्ववर्त्ती ‘सह’ पद के साथ पढ़ा गया है । तत्पश्चात् इसके साथ ‘इति’ पद लगा कर ‘राज्ञेति’ बनाकर पश्चात् फिर ‘राज्ञा’ भी पढ़ना होता है। इसी प्रकार मन्त्र के अन्तिम पद को भी पढ़ना होता है ।
मन्त्रों के स्मरण करने में क्रमपाठ नितान्त उपयोगी सिद्ध होता है। वैदिक इस क्रमपाठ को ‘योगरूढा संहिता’ भी कहते हैं ।
महर्षि व्याडि ने इसके आगे आठ प्रकार के –
- जटा,
- माला,
- शिखा,
- रेखा,
- ध्वज,
- दण्ड,
- रथ
- घन, – पाठ विधान किये हैं।
क्रमशः उनके लक्षण तथा उदाहरण देखिये-
४. जटापाठ
पहले प्रथम तथा द्वितीयपद; पश्चात् द्वितीय तथा प्रथमपद; उसके अनन्तर प्रथम द्वितीयपद; इसी प्रकार द्वितीय तृतीय आदि पदों के विषय में भी जानना चाहिये । यथा-
१ ओषधयः सम्, समोषधयः,ओषधयः सम् ।
२ सं वदन्ते, वदन्ते सम् , संवदन्ते ।
३ वदन्ते सोमेन, सोमेन वदन्ते, वदन्ते सोमेन ।
४ सोमेन सह, सह सोमेन, सोमेन सह ।
५ सह राज्ञा, राज्ञा सह, सह राज्ञा ।
६ राज्ञेति राज्ञा ।
७ यस्मै कृणोति, कृणोति यस्मै, यस्मै कृणोति ।
८ कृणोति ब्राह्मणः, ब्राह्मणः कृणोति, कृणोति ब्राह्मणः ।
९ ब्राह्मणस्तम् , तं ब्राह्मणः, ब्राह्मणः, ब्राह्मणस्तम् ।
१० तं राजन्, राजंस्तम्, तं राजन् ।
११ राजन् पारयामसि, पारयामसि राजन्, राजन् पारयामसि ।
१२. पारयामसीति पारयामसि ||
इसमें यदि समीप पढ़े जाने वाले पदों में सन्धि की अपेक्षा हो तो उनकी सन्धि करके पढ़ना उचित माना जाता है ।
पूर्वार्ध तथा उत्तरार्ध के अन्तिम पदों की आवृत्ति क्रमपाठ में निरूपित आवृत्ति के समान ही है ।
५. मालापाठ
आधे-आधे मन्त्र के प्रथम दो पदों के साथ अन्तिम, पश्चात् दूसरे तीसरे के साथ अन्तिम तथा उपान्तिम, फिर तीसरे चौथे के साथ, चौथा तथा उपान्तिम । इस प्रकार यह माला होती हुई भी जटिल सी लगती है । इसका स्वरूप देखने से इसकी जटिलता जाती रहेगी सावधानता से देखिये-
माला के दो भेद हैं एक क्रममाला, दूसरा पुष्पमाला |
(क) ओषधयः सम्, राज्ञेति राज्ञा ।
(ख) संवदन्ते, राज्ञा सह ।
(ग) वदन्ते सोमेन, सह सोमेन ।
(घ) सोमेन सह, सोमेन वदन्ते ।
(ङ) सह राज्ञा, वदन्ते सम् ।
(च) राज्ञेति राज्ञा, समोषधयः ।
(छ) यस्मै कृणोति, पारयामसीति पारयामसि ।
(ज) कृणोति ब्राह्मणः, पारयामसि राजन्।
(झ) ब्राह्मणस्तम्, राजंस्तम् ।
(ञ) तं राजन्, तं ब्राह्मणः ।
(ट) राजन् पारयामसि, ब्राह्मणः कृणोति।
(ठ) पारयामसीति पारयामसि ।
(ड) कृणोति यस्मै ।
ध्यान से देखा जाये तो यह ऐसा है कि यदि एक फुट को दोहरा कर दिया जाये, जैसा वह होगा । वैसा ही यहाँ भी है । उदाह्रियमाण के पूर्वार्ध छः पद हैं । क्रममाला बनाने के लिए पहले प्रथम तथा द्वितीय पद [ ओषधयः सम्] के साथ छठा, पूर्वार्ध का अन्तिम [ राज्ञोति राज्ञा ], उसको ‘इति’ लगा कर आवृत्ति से पढ़ना है । यह (क) में है । उसके पश्चात् द्वितीय तृतीय पदों [ सं वदन्ते ] के साथ छठा पांचवां [ राज्ञा सह ] यह (ख) में । तदुत्तर तृतीय चतुर्थ [ वदन्ते सोमेन ] के साथ पंचम चतुर्थ [ सह सोमेन ] पद; यह (ग) में है । पश्चात् चतुर्थ पंचम [सोमेन सह] के साथ चतुर्थ तृतीय [ सोमेन वदन्ते ] पद यह (घ) में है । इसके अनन्तर पञ्चमषष्ठ [ सह राज्ञा ] पदों के साथ तृतीय द्वितीय [वदन्ते सम्] पद यह (ङ) में है । और तदुत्तर षष्ठ साव- त्तिक [ राज्ञेति राज्ञा ] के साथ द्वितीय प्रथम [ समोषधयः ] पढ़े गये हैं, यह (च) में है ।
तनिक विचार से कार्य लिया जाये । तो स्पष्ट ज्ञात हो जायेगा कि इसमें क्रमपाठ और उलटे क्रम ( व्युत्क्रम ) का संमिश्रण हुआ है ।
देखिये क्रमपाठ इस प्रकार बनता है-
ओषधयः सम् । सं वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राज्ञा । राज्ञेति राज्ञा ।
व्युत्क्रमपाठ इस प्रकार होता है-
राज्ञेति राज्ञा । राज्ञा सह । सह सोमेन । सोमेन वदन्ते । वदन्ते सम् । समोषधयः ।
इस व्युत्क्रम को देखिए । क्रम को उलटा करने यह बना इस क्रममाला को इस प्रकार लिखा जाय तो हमारी बात स्पष्ट हो जाती है-
# ×
(क) ओषधयः सम् राज्ञेति राज्ञा
(ख) सं वदन्ते राज्ञा सह
(ग) वदन्ते सोमेन सह सोमेन
(घ) सोमेन सह सोमेन वदन्ते
(ङ) सह राज्ञा वदन्ते सम्
(च) राज्ञेति राज्ञा समोषधयः
इसमें इस # चिह्न के नीचे क्रमपाठ है और इस × के नीचे व्युत्क्रमपाठ है ।
इसी प्रकार उत्तरार्ध का क्रममाला पाठ बनता है । अब पुष्पमाला का स्वरूप भी देखिए-
पुष्पमाला पाठ जटापाठ के समान होता है । अर्थात् उसमें क्रम [ एक पद के अनन्तर दूसरा ] फिर व्युत्क्रम [ दूसरे पद के साथ प्रथम पद ] और संक्रम प्रथम के पश्चात् द्वितीय पद आता है और उसके उत्तर में इति पद भी लगता है । कई आचार्य पदों के सन्धिस्थल में भी ‘इति’ पद जोड़ने का विधान करते । यथा ‘समोषधयः इति सम् ओषधयः ।
(क) ओषधयः सम्, समोषधयः, ओषधयः सम् इति।
(ख) सं वदन्ते, वदन्ते सम्, सं वदन्ते इति ।
(ग) वदन्ते सोमेन, सोमेन वदन्ते, वदन्ते सोमेन इति ।
(घ) सोमेन सह, सह सोमेन, सोमेन सह इति ।
(ङ) सह राज्ञा, राज्ञा सह, सह राज्ञा इति ।
(च) राज्ञेति राज्ञा
(छ) यस्मै कृणोति, कृणोति यस्मै, यस्मै कृणोति इति ।
(ज) कृणोति ब्राह्मणः, ब्राह्मणः कृणोति, कृणोति ब्राह्मणः इति ।
(झ) ब्राह्मणस्तम् , तं ब्राह्मणः, ब्राह्मणस्तम् इति।
(ज) तं राजन् , राजस्तम्, तं राजन् इति ।
(ट) राजन् पारयामसि, पारयामसि राजन्, राजन् पारयामसि इति
(ठ) पारयामसीति, पारयामसि ।
६. शिखापाठ–
जटापाठ ( क्रम, व्युत्क्रम और संक्रम ) के साथ अगला पद जोड़ने से शिखापाठ बनता है । यथा
(क) ओषधयः सम्, समोषधयः, ओषधयः सम्वदन्ते ।
(ख) सं वदन्ते, वदन्ते सम्, सं वदन्ते – सोमेन ।
(ग) वदन्ते सोमेन सोमेन, वदन्ते, सोमेन वदन्ते – सह ।
(घ) सोमेन सह, सह सोमेन, सोमेन सह – राज्ञा ।
(ङ) सह राज्ञा, राज्ञा सह, राज्ञा सह ।
(च) राज्ञेति राज्ञा ।
(छ) यस्मै कृणोति, कृणोति यस्मै, यस्मै कृणोति — ब्राह्मणः ।
(ज) कृणोति ब्राह्मणः, ब्राह्मणः कृणोति, कृणोति ब्राह्मणस्तम् ।
(झ) ब्राह्मणस्तम्, तं ब्राह्मणः, ब्राह्मणस्तं — राजन् ।
(ञ) तं राजन्, राजस्तम्, तं राजन् – पारयामसि ।
(ट) राजन् पारयामसि, पारयामसि राजन्, राजन् पारयामसि ।
(ठ) पारयामसीति पारयामसि ।
७. रेखा = लेखा पाठः-
दो, तीन, चार, पाँच पदों के क्रम से, पृथक्-पृथक् तथा विपरीत रखने से रेखा = लेखा पाठ बनता है ।
पूर्वार्ध का:-
दो पदों का क्रम – ओषधयः सम् । समोषधयः । ओषधयः सम् ।
तीन पदों का क्रम – सं वदन्ते सोमेन, सोमेन वदन्ते सम्, सं वदन्ते सोमेन ।
चार पदों का क्रम – वदन्ते सोमेन सह राज्ञा । राज्ञा सह सोमेन वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राज्ञा । राज्ञेति राज्ञा ।
उत्तरार्ध का:—
दो पदों का क्रमः – यस्मै कृणोति, कृणोति यस्मै । यस्मै कृणोति ।
तीन पदों का क्रमः -कृणोति ब्राह्मणस्तम् । तं ब्राह्मणः कृणोति । कृणोति ब्राह्मणः ।
चार पदों का क्रमः – ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि, पारयामसि राजस्तं ब्राह्मणः । ब्राह्मणस्तम् । तं राजन् । राजन् पार- यामसि । पारयामसीति पारयामसि ।
समूचे मन्त्र का इस प्रकार होगा:-
दो पदो का क्रम – ओषधयः सम्, समोषधय । ओषधयः सम् ।
तीन पदो का क्रम – सं वदन्ते सोमेन । सोमेन वदन्ते सम् । सं वदन्ते।
चार पदो का क्रम – वदन्ते सोमेन सह राज्ञा । राज्ञा सह सोमेन वदन्ते । वदन्ते सोमेन ।
पांच पदो का क्रम – सोमेन सह राज्ञा यस्मै कृणोति । कृणोति यस्मै राज्ञा सह सोमेन । सोमेन सह ।
छः पदो का क्रम – सह राज्ञा यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तम् । तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै राज्ञा सह । सह राज्ञा ।
सात पदों का क्रम – राज्ञा यस्मै कृणोति ब्राह्मस्तं पारयामसि । पारयामसि राजंस्तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै राज्ञा । राज्ञा यस्मै । यस्मै कृणोति । कृणोति ब्राह्मणः । ब्राह्मणस्तम् । तं राजन् । राजन् पारयामसि । पारयामसीति पारयामसि ।
८. ध्वज पाठः-
आदि का क्रम अन्त से लौटाने को ध्वज पाठ कहते हैं । यह पाठ वर्ग का भी होता है और मन्त्र का भी ।
🔺 ⛛
(क) ओषधयः सम् पारयामसि
(ख) सं वदन्ते राजन् पारयामसि
(ग) वदन्ते सोमेन तं राजन्
(घ) सोमेन सह ब्राह्मणस्तम्
(ङ)सह राज्ञा कृणोति ब्राह्मणः
(च)राज्ञेति राज्ञा यस्मै कृणोति
(छ) यस्मै कृणोति राज्ञेति राज्ञा
(ज) कृणोति ब्राह्मणः सह राज्ञा
(झ) ब्राह्मणस्तम् सोमेन सह
(ञ) तं राजन् वदन्ते सोमेन
(ट) राजन् पारयामसि सं वदन्ते
(ट) पारयामसीति पारयामसि ओषधयः सम्
🔺के नीचे क्रम है। ⛛ के नीचे अन्त से आदि की ओर क्रम है । वर्ग का ध्वजपाठ ‘वेदवाद’ ग्रन्थ में दर्शायेंगे ।
९. दण्ड पाठ:-
क्रम के पश्चात् विपरीत । पुनः क्रम, पश्चात् उत्तर पद क्रम ।
यह आधे आधे मन्त्र का किया जाता है ।
(क) ओषधयः सम् । समोषधयः ।
(ख) ओषधयः सम् । सं वदन्ते । वदन्ते समोषधयः ।
(ग) ओषधयः सम् । सं वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन वदन्ते समोषधयः ।
(घ) ओषधयः सम् । सं वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह सोमेन वदन्ते समोषधयः ।
(ङ) ओषधयः सम् । सं वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राज्ञा । राज्ञा सह सोमेन वदन्ते समोषधयः ।
(च) ओषधयः सम् । सं वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राज्ञा । राज्ञेति राज्ञा ।
उत्तरार्ध का देखियेः-
(क) यस्मै कृणोति । कृणोति यस्मै ।
(ख) यस्मै कृणोति । कृणोति ब्राह्मणः । ब्राह्मणः कृणोति यस्मै ।
(ग) यस्मै कृणोति । कृणोति ब्राह्मणः । ब्राह्मणस्तम् । तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै ।
(घ) यस्मै कृणोति । कृणोति ब्राह्मणः । ब्राह्मणस्तम् । तं राजन् । राजंस्तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै ।
(ङ) यस्मै कृणोति कृणोति ब्राह्मणः । ब्राह्मणस्तम् । तं राजन् । राजन् पारयामसि ॥ पारयामसि राजंस्तं ब्रह्मणः कृणोति यस्मै ।
(च) यस्मै कृणोति । कृणोति ब्रह्मणः । ब्राह्मणस्तम् । तं राजन् । राजन् पारयामसि । पारयामसोति पारयामसि ॥
१०. रथपाठः–
दण्डपाठ के समान पाद पाद वा आधे आधे मन्त्र को क्रम व्युत्क्रम से एक साथ कहने से रथपाठ बनता है ।
रथ के द्विचक्र, त्रिचक्र और चतुश्चक्र नामक ३ भेद हैं । हम यहाँ केवल द्विचक्र रथ का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। शेष के उदाहरण वेदवाद में लिखे जायेंगे ।
पूर्वार्ध उत्तरार्ध
(क) ओषधयः सम् समोषधयः यस्मै कृणोति कृणोति यस्मै
(ख) १ ओषधयः सम् यस्मै कृणोति
२ सं वदन्ते कृणोति ब्राह्मणः
३ वदन्ते समोषधयः ब्राह्मणः कृणोति यस्मै
(ग) १ ओषधयः सम् यस्मै कृणोति
२ सं वदन्ते कृणोति ब्राह्मणः
३ वदन्ते सोमेन समेन वदन्ते समोषधयः ब्राह्मणस्तम् तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै
(घ) १ ओषधयः सम् यस्मै कृणोति
२ सं वदन्ते कृणोति ब्राह्मणः
३ वदन्ते सोमेन ब्राह्मणस्तम्
४ सोमेन सह सह सोमेन वदन्ते समोषधयः । तं राजन् राजस्तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै
(ङ) १ ओषधयः सम यस्मै कृणोति
२ सं वदन्ते कृणोति ब्राह्मणः
३ वदन्ते सोमेन ब्राह्मणस्तम्
४ सोमेन सह तं राजन्
५ सह राज्ञा राज्ञेति राज्ञा राजन् पारयामसि पारयामसोति पारयामसि
११. घनपाठ–
अन्त से आदि की ओर क्रम-पाठ करने और आदि से अन्त पर्यन्त क्रमपाठ करने से यह बनता है। आधे आधे मन्त्र का यह किया जाता है
इसके चार भेद हैं। शेष के उदाहरण ‘वेदवाद’ में देंगे ।
(क) १ – पूर्वार्ध का अन्त से आदि की ओर –
राज्ञेति राज्ञा । सह राज्ञा । सोमेन सह । वदन्ते सोमेन । सं वदन्ते । ओषधयः सम् ।
२ – आदि से अन्त पर्यन्त-
[ ओषधयः सम् । ] सं वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह सद्द राज्ञा । राज्ञेति राज्ञा ॥
(ख) १. उत्तरार्ध का अंत से आदि की ओर –
पारयामसीति पारयामसि । राजन् पारयामसि । तं राजन् । ब्राह्मणस्तम् । कृणोति ब्राह्मणः । यस्मै कृणोति ।
२. – उत्तरार्ध का आदि से अन्त की ओर—
[ यस्मै कृणोति । ] कृणोति ब्राह्मणः । ब्राह्मणस्तम् । तं राजन् । राजन् पारयामसि । पारयामसीति पारयामसि ।











