धर्म मेघ का आवाहून

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वृषा ह्यसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे। पवमान स्वाध्यः

॥ साम. ४८०-७८४ ऋग. ६.६५.४

तर्जः मळ तुळलीगल पेरिन नीडूमी

पड़ा नालियों में जल तो सड़ता रहा
तपा सूर्य से वाष्प, बन उड़ता रहा
पृथ्वी से ऊपर ये जल उठ गया
होके सवन अब वो निर्मल हुआ
कन्धों पे वायु के, जल चढ़ गया
आकाश पे उसका तख़्त बन गया
॥ पड़ा नालियों में॥

जिस जल को इस पृथ्वी ने दूर किया
बाट जोहे नैन उठाती वही ये धरा
सूखने लगा है इस पृथ्वी का गला
हरी कर दो छाती मेघों कर दो वर्षा
मेधों ने सुन ली धरा की पुकार
रिमझिम लगी बरसने सावन-फुहार ।
॥ पड़ा नालियों में॥

योगियों ने भी तो ऐसा यज्ञ किया
बाजार गलियों से ही मानव चुना
तपस्या की किरणों पे सवार हो गया।
देवयान का वो योगी यात्री बन गया।
वासी जमीन का ना हमें वो लगा
रास्ता प्रकाश का ले वो ऊँचा उठा
॥ पड़ा नालियों में॥

तेजोमय मुखमण्डल पे झलका प्रकाश
चमका दिया अग्नि ने उड़ा लेके आँच
सपनों का स्वर्ग उसकी आँखों में बसा
सूक्ष्म संसार का बाह्य रूप दिखा
भावना आशाओं का योगी का जहाँ
ऐसे दिव्य योगी को ढूँढता समाँ॥
॥ पड़ा नालियों में॥