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धर्म के लक्षण

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समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमे॑षाम् ।

समानं मन्त्रभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ ऋः १०.१६१.३

तर्जः मेलेविन्निन मुत्ततारी…

ऐ प्यारे मनुष्य लोगो, जो विचार हैं सत्य असत्य के
सभी परस्पर के विचार हों वेद-समान
धर्मयुक्त हों सबके हित में मिलकर सोचें जो हों ऋत में
जिसमें सबके सुखों का हो वरदान
जिसमें सारी मानव जाति का बढ़ता जाए ज्ञान और मान
विद्याभ्यास ब्रह्मचर्य के हों काम
॥ऐ प्यारे ॥

अच्छे अच्छे लोगों की बनी सजग सभाओं से
जिसमें बुद्धि बल पराक्रम आदि सारे गुण बढ़ जाएँ
राज्य प्रबन्धक हों अतिगुणवान
उत्तम मर्यादा शुद्ध विचार
मन होवे अविरोधी, सुख-संयम के सहयोगी
समतुल्य समझें सबको, ना स्वार्थी हों न लोभी
संकल्प और विकल्प का मार्मिक होवे ज्ञान॥
॥ऐ प्यारे ॥

मन भरा हो संकल्पों से होवें सदा ही पुरुषार्थी
अविरूद्ध दृढ़ हो धर्म-ज्ञान
शुभ विचार से हो अंकित यथावत हमारे चित्त पर
निःस्वार्थ मन चित्त हों समान
देवे लोगों को सुख ही, ना चेष्टा करें दुःख की
बनके सबका उपकारी इच्छा रखें अमृत की
हम करें न्याय दया, सत्य का ये विधान॥
॥ऐ प्यारे ॥

कहते प्यारे कृपा निधान! ले लो शुभ व्रतों का ज्ञान
मेरी आज्ञा का रख लो मान
सत्य का हो जाए आगम और असत्य का हो नाशन
हो कर्म-त्रुटियों का निदान
तुम लेन देन को समझो इसे धर्मयुक्त ही मन दो
व्यवहार करो ना अनमन, संयोग सत्य का कर लो
रच दिया है मैंने ही तो सत्य का ही संविधान ॥ ॥ ऐ प्यारे ॥