धन्य है तुझको हे ऋषि, तूने हमें जगा दिया।

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धन्य है तुझको हे ऋषि, तूने हमें जगा दिया।

धन्य है तुझको हे ऋषि,
तूने हमें जगा दिया।
सो-सो के लूट रहे थे हम,
तूने हमें जगा दिया।।

अंधे को आँखें मिल गई,
मुर्दों में जान आ गई।
जादू-सा क्या चला दिया,
अमृत-सा क्या पिला दिया।
धन्य है तुझको ऋषि, तूने …..

वाणी में क्या तासीर थी,
स्वामीजी तेरी बात पर।
कितने शहीद हो गये,
कितनों ने सर कटा दिया।।
धन्य है तुझको ऋषि, तूने……

श्रद्धा से श्रद्धानन्द ने,
सीने में खाई गोलियाँ।
हंस-हंस के हंसराज ने,
तन मन व धन लुटा दिया।।
धन्य है तुझको ऋषि, तूने……

तेरे दीवाने जिस घड़ी,
दक्षिण दिशा को चल दिये।
वैदिक धरम पे हो फिदा,
दुनिया का दिल दहला दिया।।
धन्य है तुझको ऋषि, तूने ………

“अज्ञानी होना गलत नहीं है, अज्ञानी बने रहना गलत है।”- महर्षि दयानन्द