पुनन्तुं मा देवजनाः पुनन्तु मन॑वो वि॒िया।
पुनन्तु विश्ववा॑ भूतानि पव॑मानः पुनातु मा ॥1
॥ अथर्व ६.१६.१
तर्ज : पूवे वाद सम्बोद
ढूँढता हूँ मैं वे लोग, जिनसे पाऊँ मैं बोध
कब से रहा उन्हें खोज; पाना है ज्ञान ओज
उनके सान्निध्य को सार्थक कर दे
तू भी स्वयं मुझे धन्य कर दे। हे पवमान, पावन कर दे।
शरण देवों की करती पावन, बरसाती जो ज्ञान का सावन (2)
देते दिखाई उन्हे जब प्यासे, प्यास अपात्रों में भी भरते,
देवों से पाते हैं स्नेह और मार्ग भी, सच्चा श्रेय (2)
जीवन में इनकी शुभ सत्यता से भाविक कर दे।॥
ढूँढता हूँ…
दिव्य गुणों को, यदि मानते हो, देवगणों को भी जानते हो (2)
अन्तःकरण हैं उनके शुद्ध, ज्ञान-कर्म में हैं वो प्रबुद्ध
इन्द्रियाँ हैं उनकी पवित्र, इसलिए वो सबके मित्र (2)
हर व्यक्ति के हृदय में उनकी अमिट छाप कर दे।
ढूँढता हूँ…
ऐसे देव तो सदा देते हैं, बदले में ना कुछ वो लेते हैं (2)
जो भी गुण हों या होंगे पदार्थ, दे देते हैं वो निस्वार्थ
हो अन्न ज्ञान या स्नेह, उपदेश शान्ति या धैर्य (2)
शुभकामना, आशीश, सुखों की, वर्षा कर देते हैं।
ढूँढता हूँ…
करें देव शुद्ध बुद्धि और मन, शुभकर्मों में होते आसन्न (2)
कर्म आचरण, होते सहज, मानवता की जागे समझ
हमें आत्मसात करें देव, सम्मुन्नत करने का ध्येय (2)
ये देव हमारे बुद्धि, ज्ञान क्रतु उन्नत कर दें।॥
ढूँढता हूँ…
सब प्राणियों में स्वसम देखें, हम भी आत्मवत् उनको समझें, (2)
दुर्व्यवहार किसी से ना करें, ईर्ष्या द्वेष घृणा से बचें
कोई कहे ना हमें अभद्र, करें दूजों की हम कद्र (2)
हम देवें ना धोखा और छल का मौका, भूल कर ना करें।॥
ढूँढता हूँ…
श्रद्धा भक्ति का हूँ मैं प्रार्थी तुम ही हो हर पल मेरे साथी (2)
मन बुद्धि आत्मा हो उन्नत, ज्ञान विवेक भी करो जागृत
भीतर बाहर की शुद्धि, हो प्रेम स्नेह की वृद्धि (2)
बस तेरी कृपा से मुग्ध हुआ हूँ, धन्य मुझे कर दे॥
ढूँढता हूँ…
(भाविक) मर्म जानने वाला। (समुन्नत) अत्यधिक बढ़ा हुआ। (आसन्न) लगा हुआ। (प्रबुद्ध) सचेत, खिला हुआ।
(श्रेय) श्रेष्ठ, कल्याण करने वाला।










