देखो वो ऋषि दयानन्द दिल में बसे हमारे
शायद जगे थे भाग्य जो ऋषिवर यहाँ पधारे, हो गए हमारे
ऋषि हम हुए तुम्हारे, तुम हुए हमारे ॥ देखो ॥
ब्रह्मचर्य के ऋषि ने जौहर अजब दिखाए
भयभीत हो के भागे दुश्मन जो बन के आए
दुश्मन भी मित्र बनकर ऋषि पर गए थे वारे ॥ देखो ॥
विधवा सति अनाथों को ऋषि तारने थे आए
समदृष्टि और दया से अधिकार सब दिलाए
जितने भी काज बिगड़े पुरुषार्थ से सँवारे ॥ देखो ॥
ईश्वर के गुण थे जितने ऋषि ने हमें बताए
इक ओ३म् नाम से ही कई भेद थे मिटाए
उस ओ३म के पुजारी ने जीवन के कई सुधारे ॥ देखो !!
कर्मों से कृष्ण बनकर दया राम सी दिखाई
वेदों की सत्य वाणी घर घर में जा सुनाई
पाखण्डी पापी दम्भी शास्त्रार्थ करके हारे ॥ देखो ॥
संयम तप और भक्ति का संगम कहाँ से लाए
उसपर भी क्या गजब है इक पल न डगमगाए
वाह रे ! ऋषि दयानन्द कैसी अजब प्रभा रे ॥ देखो ॥
जितने जहर पिलाये उतना निखर के आए
तपकर बने थे कुन्दन रवि तुल्य जगमगाए
दयानन्द ऋषि की बोलें जय एक स्वर से सारे ॥ देखो !!










