दयानन्द तुम थे दयावान्
गुणों के थे भंडार ॥ दयानन्द तुम…
निकले थे अपने घर से, मिलना था सच्चे शिव से
तो आए गुरुद्वार ॥ दयानन्द तुम…
तुमने बजाई बंसी, वेदों के स्वर से ॥ 2 ॥
जगाया संसार ॥ दयानन्द तुम…
दुःखियों के आँसू, बहते, ऋषि कैसे ये सब सहते
हुए थे दिलेज़ार ॥ दयानन्द तुम…
मतवादी पंथी बहके, अज्ञान में रहके (2)
मिटाया अन्धकार ॥ दयानन्द तुम…
नफरत के शोले भड़के, मानव था दानव स्तर पे
सिखाया सत्याचार ॥ दयानन्द तुम…
कपटी थे गाली बकते, ऋषि अनसुनी करते
थे संयमी अपार ॥ दयानन्द तुम…
कुन्दन बने ऋषि तप से, नहीं एक के थे सबके
दिलों में भरा प्यार ॥ दयानन्द तुम…
सत्य था जीवन से बढ़के, डरे ना वो विष खंजर से
मृत्यु भी गई हार ॥ दयानन्द तुम…
गए हँसते हँसते जग से, ईश आज्ञा, धर ली सर
खुला था मोक्ष द्वार ॥ दयानन्द तुम…










