दयानन्द तेरे अनुपम उपकार
हृदय के भाव जगाते हैं
दया प्रेम त्याग परहित मिलकर
इक स्वर तेरी गाथा गाते हैं ॥ दयानन्द तेरे…
कैसी दुर्दशा थी भारत की, विद्या वेदों की नादारत थी
तेरे जैसे ऋषि ज्ञानी ही, आकर अज्ञान मिटाते हैं ॥ दया प्रेम…
फैले थे कितने मत पाखण्ड, वेदों का बजाया अमर शंख
उपनिषद् वेद के हर पन्ने, अब तेरी छबि दिखाते है ॥ दया प्रेम…
नारी पे विपदा भारी थी, कटती गौएँ हितकारी थी
तेरे जैसे उपकारक ही, गौ अबलाओं को बचाते हैं ॥ दया प्रेम…
हर कौम को ऋषि तुम प्यारे थे, जग-प्रेम के भाव तुम्हारे थे
तेरे जैसे ही मित्र सखा संसार को कुटुम्ब बनाते हैं । दया प्रेम…
ऋत सत्य हृदय के द्वारे थे जिसने किए तर्क वो हारे थे
ऋषि सबके हृदय की बगियाँ में सत्यार्थ प्रकाश उगाते हैं ॥ दया प्रेम…
आँखे सुख वैभव से मोड़ी सबको सुख पहुँचाने दौड़ी
तेरे जैसे अनुपम माली वेदों में बहारें लाते हैं ॥ दया प्रेम…
तुम धर्म के खातिर विष चखते, पर हित के लिए अमृत रखते
तेरे जैसे दयावान ऋषि संसार में विरले आते हैं ॥ दया प्रेम…
तेरी आत्मज्योति को ऋषि प्यारे, महसूस आज भी करते हैं
क्या तेरे जैसे पूर्ण पुरुष हृदयों से भुलाए जाते हैं? ॥ दया प्रेम…










