दयानन्द देश को जगा गया अपने पुरुषार्थ से

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दयानन्द देश को जगा गया अपने पुरुषार्थ से

तर्ज : दिल उनको उठा के दे दिया

दयानन्द देश को जगा गया अपने पुरुषार्थ से
चलके सन्मार्ग पे पर्दा अज्ञान का हटा गया ॥ दयानन्द देश…

जुल्मों से हुआ सामना दर्द उफ ना कोई आह ना

कष्ट सहते गए पर ना विचलित हुए कष्ट भी मुश्किलों में पड़ गया

॥ दयानन्द देश…

धरती वेदों की थी सो गई पराधीन धरा हो गई

वेद शिक्षा हुई धर्म रक्षा हुई धर्म वैदिक ऋषि बता गया ॥ दयानन्द ॥

वेद पढ़ना था और था पढ़ाना वेद सुनना था और सुनाना

वेद कर्मी बने आर्य धर्मी बने वेद पूर्ण ज्ञान है बता गया ॥ दयानन्द ॥

ऋषि के हाथों में ध्वज ओ३म् का भाईचारा था हर कौम का

सिक्ख ईसाई थे मुस्लिम भाई भी थे समदृष्टि ऋषि दिखा गया ॥ दयानन्द ॥

काम ऋषि का था हित चाहना मन में कोई ना वैर भावना

धर्म आधार था कर्म निष्काम था शुद्ध आचरण ऋषि सिखा गया ॥ दयानन्द !!

युग प्रवर्तक को क्यों भूले हम क्यों न थामे ऋषि का दामन

मिलके चलते रहें हम कदम-कदम ऋण चुकाने का वक्त आ गया ॥ दयानन्द ॥