दया निकला प्रण लेके

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दया निकला प्रण लेके

दया निकला प्रण लेके,
जीवन के एक सफर में ।
एक मोड़ आया, दया जी घर छोड़ आया ।
न जाने उनके ही मन में,
क्यों ये खयाल आया ।
दया जी घर छोड़ आया ।

अन्तरा – जब छोड़ के घर वो निकल पड़े
घर वाले उनके पीछे पड़े
पर रोक कोई क्या सकता है
जिस को मुक्ति की आस लगे ।
वो भागे, तब जागे, बढ़ते-बढ़ते,
आगे-आगे । चारों और आया ।।
दया जी घर… ।।१।।

विरजानन्द से फिर जाके मिले,
अष्टाध्यायी और वेदज्ञान सिखें ।
लेकर आदेश गुरूजी का,
सत्य धर्म का वो प्रसार किये ।
वो उखाड़े मूर्त्ति को, वो मिटाये
पाखण्ड को सत्य ज्ञान लाया,
दया जी घर…।।२।।