भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कई महान वैज्ञानिक दिए हैं, जिनमें से एक प्रमुख नाम डॉ. जगदीश चन्द्र बोस का है।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि न केवल प्राणियों में, बल्कि वनस्पतियों में भी जीवन होता है। वे भौतिकी और जीवविज्ञान के क्षेत्र में समान रूप से योगदान देने वाले दुनिया के पहले वैज्ञानिकों में से एक थे।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. जगदीश चन्द्र बोस का जन्म 20 नवम्बर 1858 को बंगाल (अब बांग्लादेश) के मयमनसिंह जिले में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द्र बोस एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, जबकि उनकी माता वामसुंदरी एक धार्मिक महिला थीं।
बचपन से ही बोस को विज्ञान और साहित्य में गहरी रुचि थी। उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता से बी.ए. किया और उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए। वहां कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से बी.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की और भौतिक शास्त्र का गहन अध्ययन किया।
शिक्षण कार्य और प्रारंभिक अनुसंधान
सन् 1885 में वे प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता में भौतिकी के प्रोफेसर बने। शिक्षण कार्य के साथ-साथ उन्होंने अनुसंधान भी जारी रखा। उन्होंने विद्युत तरंगों पर प्रयोग किए और एक ऐसा यंत्र विकसित किया, जिससे बिना तार के संदेश भेजना संभव हो गया। इस खोज के लिए उन्हें लंदन विश्वविद्यालय से ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ की उपाधि प्राप्त हुई।
बोस ने अपने प्रयोगों से यह भी सिद्ध किया कि धातुएं और वनस्पतियां बाहरी प्रभावों के प्रति संवेदनशील होती हैं। इसी दौरान उन्हें पौधों में जीवन के प्रमाण मिले और उन्होंने इस पर गहन शोध किया।
वनस्पति विज्ञान में क्रांति
बोस ने यह साबित करने के लिए एक ‘क्रेस्कोग्राफ’ नामक यंत्र का आविष्कार किया, जो पौधों की संवेदनशीलता और वृद्धि दर को माप सकता था। उन्होंने यह दिखाया कि जब पौधों को चोट पहुंचाई जाती है या विष दिया जाता है, तो वे प्रतिक्रिया देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई प्राणी करता है।
उनके इन प्रयोगों ने वनस्पति विज्ञान की दुनिया में क्रांति ला दी और यह प्रमाणित कर दिया कि पौधे भी जीवधारी हैं।
महत्वपूर्ण खोजें और उपलब्धियां
- विद्युत तरंगों (रेडियो वेव्स) का आविष्कार – बोस ने 2.5 से 0.5 सेमी की सूक्ष्म विद्युत तरंगों का निर्माण किया और रिसीवर तैयार किया, जिससे बिना तार के संचार संभव हुआ।
- क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार – यह यंत्र पौधों की संवेदनशीलता और प्रतिक्रिया को मापने के लिए उपयोग किया गया।
- प्लांट इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी – उन्होंने सिद्ध किया कि पौधे बाहरी प्रभावों के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं।
- फोटोवोल्टिक सेल पर शोध – उनके कार्यों ने आगे चलकर इलेक्ट्रॉनिक्स में फोटोवोल्टिक सेल और सेमीकंडक्टर तकनीक को प्रेरित किया।
- वैज्ञानिक ग्रंथों का प्रकाशन – उनके प्रमुख शोधग्रंथों में शामिल हैं:
- “लिविंग एंड नॉन लिविंग”
- “प्लांट रिस्पॉन्स”
- “कम्पेरेटिव इलेक्ट्रो साइकोलॉजी”
सम्मान और पुरस्कार
डॉ. जगदीश चन्द्र बोस को उनके अद्भुत योगदान के लिए कई सम्मान मिले:
- 1904 में उनकी खोजों का पेटेंट स्वीकृत हुआ।
- 1920 में वे रॉयल सोसाइटी के सदस्य बने।
- 1928 में विएना में एकेडमी ऑफ साइंस के विदेश सचिव नियुक्त हुए।
- वे लीग ऑफ नेशंस के अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग समिति के सदस्य भी रहे।
बसु विज्ञान मंदिर और अंतिम समय
विज्ञान को समर्पित अपने जीवन के दौरान उन्होंने 1917 में ‘बसु विज्ञान मंदिर’ (Bose Institute) की स्थापना की, जो आज भी अनुसंधान का प्रमुख केंद्र है।
स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण 24 नवम्बर 1936 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके कार्य आज भी विज्ञान की दुनिया को रोशनी प्रदान कर रहे हैं।
निष्कर्ष
डॉ. जगदीश चन्द्र बोस भारतीय विज्ञान के पितामह थे। उन्होंने रेडियो तरंगों, इलेक्ट्रॉनिक्स और वनस्पति विज्ञान में महान योगदान दिया। उनके शोधों ने संचार क्रांति और जैव विज्ञान में नई दिशाएं खोलीं। उनका जीवन विज्ञान, नवाचार और समर्पण का प्रतीक है। भारत और संपूर्ण विश्व उनके योगदानों के लिए हमेशा ऋणी रहेगा।

विस्तृत जीवन परिचय
प्राणियों में ही नहीं अपितु वनस्पति में भी जीव है यह सिद्ध करने वाले महान भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस का जन्म 20 नवम्बर 1858 में ढ़ाका समीप मयमनसिंह नामक नगर में हुआ था। वर्तमान में ढ़ाका बांग्लादेश की राजधानी है।
जगदीश चन्द्र बोस के पिताजी भगवानचन्द्र डेप्युटी मेजिस्ट्रेट थे। आपकी माता वामसुंदरी एक ईश्वरपरायण और धार्मिक महिला थी।
जगदीश चन्द्र को बचपन से ही पदार्थ विज्ञान के साथ-साथ संस्कृत साहित्य में भी गहन रुचि थी। आपने कोलकाता की सेन्ट जेवियर्स कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा पास की थी। उसके बाद आप केम्ब्रिज युनिवर्सिटी में अभ्यास हेतु इंग्लैण्ड गए। वहां से सन् 1884 ई. में बी.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की और भौतिक शास्त्र पर कार्य किया।
सन् 1885 ई. में जगदीश चन्द्र कोलकत्ता की प्रेसिडेन्सी कालिज में पदार्थ विज्ञान के अध्यापक बने। सन् 1890 ई. में आपने पेरिस में आयोजित पदार्थ वैज्ञानिकों के सम्मेलन में भाग लिया।
अपने प्रेसिडेन्सी कॉलेज में अध्ययन कार्य करते हुए एक ऐसा यन्त्र तैयार किया जिसकी सहायता से 2.5 से 0.5 से.मी. के अत्यन्त सूक्ष्म परिमाण के विद्युत तरंगों का निर्माण किया जा सके। आपने इस विद्युत को विद्युतकिरण के उद्गम से दूर पकड़ सके ऐसा ग्राहक यन्त्र (रिसीवर) भी तैयार किया। इस यन्त्र की सहायता से बिना तार ही संदेश भेजना सम्भव हुआ। इस संशोधन के लिए आपको लन्दन विश्वविद्यालय की डॉक्टर ऑफ सायन्स’ की पदवी मिली।
जब जगदीश चन्द्र अपनी विद्युत सम्बन्धी शोध कर रहे थे उसी समय ही आपके मन में विचार आया कि इस संशोधन का प्रयोग वनस्पति पर किया जाए। आपने यह सिद्ध किया कि वनस्पति में भी जीवन होता है और वे भी दुःख या कष्ट दिए जाने पर पीड़ा से छटपटाते हैं। इसके लिए आपने मैग्नेटिक कोस्मोग्राफ नामक यन्त्र को बनाया। विश्व के वैज्ञानिकों ने भारतीय दर्शन के इस शाश्वत सन्य का स्वीकार किया कि वनस्पति में भी जीवन होता है।
सन् 1896 ई. में जगदीश चन्द्र बोस ने लिवरपुल में रॉयल इन्स्टिट्यूट में वैज्ञानिकों के समक्ष अपने इस नवीनतम आविष्कार पर प्रवचन दिया। सन् 1904 ई. में श्रीमती बुज की अर्जी के आधार पर आपका पेटन्ट का स्वीकृत हुआ। आप इन सभी यन्त्रों के निर्माणकर्ताओं में अग्रसर थे, जिनके द्वारा आधुनिक युग में फोटो वोल्टेक सेल की सहाय से इलेक्ट्रोनिक यन्त्रों का निर्माण हो रहा है।
1920 ई. में आप रोयल सोसायटी के सदस्य चुने गए। 1922 ई. में लीग ऑफ नेशन्स में आपको अन्तर्राष्ट्रीय इन्टेलेक्चुअल कॉपरेटिव कमेटी के सदस्य बनाए गए। 1925 ई. में जिनेवा में विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टाईन के साथ आपकी भेंट हुई। 1928 ई. में आप विएना में एकेडमी ऑफ सायन्स के विदेश सचिव नियुक्त हुए।
सन् 1902 से 1907 ई. के बीच प्रकाशित हुए आपके मुख्य शोधग्रंथ हैं – 1. लिविंग एंड नोन लिविंग 2. प्लान्ट रिस्पोन्स 3. कम्परेटिव इलेक्ट्रो साईकोलॉजी
डॉ. जगदीश चन्द्र बोस ने अपना जीवन विज्ञान को समर्पित कर दिया। आपने सन् 1917 ई. में ‘बसु विज्ञान मन्दिर’ का निर्माण कराया। सन् 1936 ई. में आपका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। अन्ततः 24 नवम्बर 1936 में भारतमाता के इस महान सपूत को काल के क्रूर हाथों ने हमारे पास से छीन लिया। आपके नाम से भारत आज विश्व में गौरवान्वित है।










