आचमन मंत्र
निम्न तीन मंत्र से एक-एक करके आचमन करेंगे (जल पियेंगे)।
ओं अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥१॥
ओं अमृतापिधानमसि स्वाहा ॥२॥
ओं सत्यं यशःश्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥३॥
अंग स्पर्श मंत्र
निम्न मत्रों से प्रथम दाएं फिर बाएं अंगों को स्पर्श करें।
ओं वाङमऽआस्येऽस्तु ||१॥ ———————— इस मन्त्र से मुख.
ओं नसोर्मे प्राणोऽस्तु॥२॥———————–इस मन्त्र से नासिका के दो छिद्र
ओं अक्ष्णोर्में चक्षुरस्तु॥३॥ —————————— इस मन्त्र से दोनों आंखे
ओं कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु॥४॥ —————————–इस मन्त्र से दोनों कान
ओं बाह्व्रोर्मे बलमस्तु॥५॥ ———————————— इस मन्त्र से दोनों बाहु
ओं ऊर्वोर्मऽओजोस्तु॥६॥-———————————– इस मन्त्र से दोनों जंघा
ओं अरिष्टानि मेऽङाग्नि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु॥७॥–————————सभी अंगो पर
अथ ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना मंत्र
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥१॥
हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा: ।
यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥
य: प्राणतो निमिषतो महित्वैक इन्द्राजा जगतो बभूव।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्व: स्तभितं येन नाक: ।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥५॥
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव ।
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥६॥
स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यत्र देवा अमृतमानशाना स्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥७॥
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥८॥
अग्न्याधान मंत्र (दीप प्रज्वलन मंत्र)
ओं भूर्भुवः॒ स्वः॒
यज्ञकुंड में अग्नि प्रदीप्त करने का मंत्र
ओं भूर्भुवः॒ स्वर्ध्यौरि॑व भू॒म्ना पृ॑थि॒वीव॑ वरि॒म्णा। तस्या॑स्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठे॒ऽ ग्निम॑न्ना॒दमन्नाद्यायादधे॥
निम्न मंत्र से यज्ञकुंड के अंदर अग्नि को बढाने के लिए कर्पूर अथवा समिधा डाले।ओम् उद् बुध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृहि॒ त्वमिष्टापूत्र्ते स्ं
सृ॑जेथाम॒यं च। अस्मिन्त्सधस्थेऽअध्युत्तरस्मिन् विश्वे॑ देवा॒ यज॑मानश्च सीदत॥
समिदाधान मंत्र
निम्न मंत्रो से आठ -आठ अंगुल की घृत में डूबी हुई तीन समिधा (लकड़ी )यज्ञकुंड में डाले। प्रथम मंत्र से प्रथम समिधा, द्वित्तीय मंत्र से द्वितीय समिधा ,तृतीय मंत्र से अंतिम समिधा डाले।ओम् अयन्त इद्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेध्द वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाध्येन समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे-इदन्न मम॥१॥
ओं स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बोधय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नये-इदन्न मम॥सुस॑मिध्दाय शो॒चिषे घृतं ती॒व्रं जु॑होतन। अग्नये॑ जा॒तवे॑दसे॑ स्वाहा॑। इदमग्नये जातवेदसे – इदन्न मम ॥२॥
ओं तन्त्वा॑ स॒मिद्भि॑रङ्गिरो घृतेन॑ वर्ध्दयामसि। बृहच्छो॑चा यविष्ठ्य॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नयेऽङ्गिरसे इदन्न मम॥३॥
पञ्चघृताहुति मंत्र
निम्न मंत्र से घृत की पांच आहुति यज्ञकुंड में डालें।ओम् अयन्त इद्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेध्द वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाध्येन समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे-इदन्न मम॥
जल-प्रसेचन मंत्र
निम्न मंत्र से हाथों में जल लेकर यज्ञ वेदी के बाहर पूर्व आदि दिशाओ में छिडकाये।ओम् अदितेऽनुमन्यस्व ॥ (यज्ञ वेदी के पूर्व भाग में जल छिडकाये।)
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व ॥ (यज्ञ वेदी के पश्चिम भाग में जल छिडकाये।)
ओम् सरस्वत्यनुमन्यस्व ॥ (यज्ञ वेदी के उत्तर भाग में जल छिडकाये।)
ओम् देव॑ सवितः॒ प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व यज्ञप॑तिं॒ भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु वाचस्पति॒र्वाचं॑ नः स्वदतु ||(पूर्व से आरंभ करके वेदी के चारो ओर।)
आघारावाज्यभागाहुति मंत्र
इस मंत्र से यज्ञ वेदी के अंदर अग्नि घृत की आहुति दें।ओम् अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये – इदन्न मम ॥(अग्नि पर उत्तर भाग में घृत की आहुति दें)
ओम् सोमाय स्वाहा ॥ इदं सोमाय – इदन्न मम ॥(दक्षिण भाग में घृत की आहुति दें)
ओम् प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये – इदन्न मम ॥ (मध्य में)
ओम् इन्द्राय स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय – इदन्न मम || (मध्य में)
प्रातःकालीन होम मंत्र
निम्न मंत्र से घृत व हवन सामग्री दोनों की आहुति दें।ओं सूर्यो॒ ज्योति॒ज्र्योतिः॒ सुर्यः॒ स्वाहा॑ ॥
ओं सूर्यो॒ वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चःस्वाहा॑ ॥
ओं ज्योतिः॒ सूर्यः॒ सूर्यो ज्योतिः॒ स्वाहा॑ ॥
ओं स॒जूर्दे॒वेन॑ सवि॒त्रा सजूरू॒षसेन्द्र॑वत्या। जु॒षाणः सूर्यो वेतु॒ स्वाहा॑ ॥
सायंकालीन होम मंत्र
ओम् अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा॥
ओम् अ॒ग्निर्वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चः॒ स्वाहा॑ ॥
ओम् अग्नि॒र्ज्योति॒- ज्र्योति॑र॒ग्निः स्वाहा॑॥(मन में बोलकर)
ओं स॒जूर्देवेन सवि॒त्रा स॒जु रात्र्येन्द्र॑वत्या जुषा॒णोऽअ॒ग्निर्वेतु स्वाहा॑॥
उभयकालीन होम मंत्र
ओं भूरग्नये प्राणाय स्वाहा। इदमग्नये प्राणाय-इदन्न मम ॥
ओं भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा इदं वायवेऽपानाय इदन्न मम ॥
ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ॥ इदमादित्याय व्यानाय – इदन्न मम् ॥
ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा ॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्रणापा- नव्यानेभ्यः – इदन्न मम ॥
ओम् आपो ज्योति रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा ॥
ओं यां मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते। तया॒ माम॒ध्य मे॒धयाऽग्ने॑ मे॒धावि॑नं कुरू॒ स्वाहा ॥
ओं विश्वा॑नि दे सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॒ सुव । यद् भ॒द्रं तन्न आ सु॑व॒ स्वाहा॑ ॥
ओं अग्ने॒ नय सु॒पथा॑ रायेऽस्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि विद्वान। यु॒यो॒ध्यस्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम॥
गायत्री मंत्र
निम्न मंत्र से तीन आहुति देवें।ओ३म् भूर्भुवः॒ स्वः तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥
स्विष्टकृदाहुति मंत्र
निम्न मंत्र से घृत अथवा खीर कीआहुति देवें।ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत् स्विष्टकृद् विध्यात् सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतिनां कामानां समर्ध्दयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्ध्दय स्वाहा॥ इदमग्नये स्विष्टकृते – इदन्न मम॥
पूर्णाहुति मंत्र
निम्न मंत्र से घृत व हवन सामग्री की तीन आहुति देवें।ओं सर्वं वै पूर्णम् स्वाहा ॥
यज्ञ प्रार्थना
पूजनीय प्रभो हमारे,
भाव उज्जवल कीजिये ।
छोड़ देवें छल कपट को,
मानसिक बल दीजिये ॥वेद की बोलें ऋचाएं,
सत्य को धारण करें ।
हर्ष में हो मग्न सारे,
शोक-सागर से तरें ॥अश्व्मेधादिक रचायें,
यज्ञ पर-उपकार को ।
धर्मं- मर्यादा चलाकर,
लाभ दें संसार को ॥नित्य श्रद्धा-भक्ति से,
यज्ञादि हम करते रहें ।
रोग-पीड़ित विश्व के,
संताप सब हरतें रहें ॥भावना मिट जाये मन से,
पाप अत्याचार की ।
कामनाएं पूर्ण होवें,
यज्ञ से नर-नारि की ॥लाभकारी हो हवन,
हर जीवधारी के लिए ।
वायु जल सर्वत्र हों,
शुभ गंध को धारण किये ॥स्वार्थ-भाव मिटे हमारा,
प्रेम-पथ विस्तार हो ।
‘इदं न मम’ का सार्थक,
प्रत्येक में व्यवहार हो ॥प्रेमरस में मग्न होकर,
वंदना हम कर रहे ।
‘नाथ’ करुणारूप ! करुणा,
आपकी सब पर रहे ॥पूजनीय प्रभो हमारे,
भाव उज्जवल कीजिये ।
छोड़ देवें छल कपट को,
मानसिक बल दीजिये ॥शांति पाठ
ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: ।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि ॥
ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥__||ओ३म्||__










