वीरांगना का पराक्रम : दम्पति बलिदानी

0
30

पृष्ठभूमि

सन् 1948 में हैदराबाद में रजाकारों की गतिविधियाँ अपने चरम पर थीं। आर्य समाज और राष्ट्रवादी शक्ति को कुचलने के लिए अत्याचार की सीमा पार की जा रही थी। इन्हीं कठिन परिस्थितियों में जिला उस्मानाबाद के भूम तहसील के ग्राम में रहने वाले श्री किशनराव टेके और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गोदावरीबाई ने असाधारण साहस का परिचय दिया।

घटना का विवरण

6 मई 1948 को उस्मानाबाद के तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर हैदरी दो पठानों और एक मुस्लिम पुलिस जवान को लेकर किशनराव जी के घर पहुँचा।उनके आँगन में “ॐ” का ध्वज लहरा रहा था।हैदरी ने आदेश दिया – “इसे तुरन्त हटा दो, अन्यथा गोलियों से उड़ा दिए जाओगे।” किंतु धर्मवीर किशनराव टेके ने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया –
मैं मृत्यु का आलिंगन कर सकता हूँ, परन्तु ‘ॐ’ के ध्वज को कभी नहीं उतारूँगा।”ज्यों ही यह वाक्य पूरा हुआ, हैदरी ने पिस्तौल से गोली चलाकर श्री किशनराव जी को शहीद कर दिया।

वीरांगना का पराक्रम

गोली की आवाज सुनते ही उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गोदावरीबाई वहाँ पहुँचीं।उन्होंने घर से बन्दूक उठाई और साहसपूर्वक मोर्चा संभाल लिया।क्षणभर में ही दोनों पठान और पुलिस जवान उनकी गोलियों से ढेर हो गए।इसके बाद हैदरी ने स्वयं गोली चलाकर वीरांगना गोदावरीबाई को भी शहीद कर दिया।इतना ही नहीं, उसने पूरे घर में आग भी लगा दी।

अमर बलिदान

किशनराव टेके और गोदावरीबाई की शहादत ने यह सिद्ध कर दिया कि –आर्य धर्म की पताका “ॐ” कभी झुक नहीं सकती।धर्मरक्षा के लिए पति-पत्नी ने हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

निष्कर्ष

इस दम्पति का बलिदान भारतीय इतिहास और आर्य समाज की परंपरा में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उनकी गाथा हमें यह संदेश देती है कि –

“धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दे देना भी सच्चे जीवन का गौरव है।”