चौधरी पीरुसिंह जी

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जन्म और प्रारम्भिक शिक्षा

खरखोदा (जि. सोनीपत) के पास देह्या गोत्र के जाट क्षत्रियों का गाँव मटिण्डू है। चौधरी पीरुसिंह जी का जन्म यहीं भादों मास की गूगा नवमी सं. 1923 में हुआ। इनके पिता का नाम चौधरी जुहारसिंह था।बालक पीरुसिंह 10 वर्ष की आयु में हसनगढ़ स्कूल में पढ़ने लगे, परंतु तीसरी कक्षा के बाद घरेलू कारणों से पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

युवावस्था और मित्रमंडली

लगभग 20 वर्ष की आयु में इनके पिता का देहांत हो गया और उन्होंने खेती का कार्य सँभाला। इसी काल में इनके दो मित्र जीवनभर साथ रहे—

1.लाला इच्छाराम जी (फरमाणा निवासी)

2.चौधरी जुयलाल जी (जेलदार जुगलाल)

आर्यसमाज से जुड़ाव

तीनों मित्र प्रारम्भ में डकैती जैसे अपराधों में फंसे रहते थे। दिल्ली में स्वामी दर्शनानन्द जी का प्रवचन सुनकर इनके जीवन की दिशा बदल गई। कर्मफल सिद्धान्त से प्रभावित होकर ये तीनों कट्टर आर्यसमाजी बने।

खाण्डा ग्राम की पंचायत और यज्ञोपवीत आन्दोलन

पौराणिकों ने जाटों को शूद्र घोषित किया, तो इसके प्रतिकार में सिसाना ग्राम की पंचायत में हजारों लोगों ने यज्ञोपवीत धारण किया। इस आन्दोलन के अगुवा चौधरी पीरुसिंह थे। पौराणिकों से शास्त्रार्थ की चुनौती आई, परंतु पं. गणपति शास्त्री को देखकर उनका प्रतिनिधि पं. शिवकुमार शास्त्री भाग खड़ा हुआ।

गुरुकुल मटिण्डू की स्थापना

चौधरी साहब ने किसानों के बच्चों को सस्ती शिक्षा व संस्कृत ज्ञान दिलाने हेतु अपनी 30 बीघा भूमि दान देकर गुरुकुल की नींव रखवाई।स्थापना : 15 अगस्त 1916, माघ शुक्ला तृतीया सं. 1971 प्रारम्भिक छात्र : 60 ब्रह्मचारी आज भी गुरुकुल उनकी स्मृति का प्रतीक है।

कट्टर आर्यसमाजी

उन्होंने आर्यसमाजियों का अपमान करने वाले थानेदार को सबक सिखाया। समाज विरोधी गतिविधियों के विरुद्ध हमेशा अग्रणी बने।

त्याग और उदारता

झूठे आरोप लगाने वाले नाई को अपने कच्चे घर दिखाकर सच्चाई समझाई। बाढ़ग्रस्त गाँवों को निःशुल्क अनाज-भूसा दिया। स्वार्थरहित सेवा और दान उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था। सेवा और किसानों के अधिकार जमींदारों पर लगान बढ़ाने की योजना का चौधरी साहब ने विरोध किया। वे किसानों के हक के लिए सदा लड़ते रहे।

गोभक्ति

गोरक्षा उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था। 1917 में कलकत्ता जाकर गायों की दुर्दशा देखी। 1933 में खाण्डा में पंचायत बुलाकर मुसलमानों को गौ-विक्रय पूर्णतः बन्द कराया। जीवन के अंतिम क्षण तक गोरक्षा पंचायत की योजना उनके मन में रही।

शुद्धि कार्य

सं. 1974 में एक ईसाई बने जाट युवक को शुद्ध कर अपने घर में रखा। रायपुर (सोनीपत) में सर्वप्रथम शुद्धि कार्य किया। दयालुता और पशु-हित अमावस्या के दिन पशुओं को विश्राम दिलाने हेतु हल चलाना बन्द करवाया। पशु-हित में कई संकल्प लिए।

स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान

7 दिसम्बर 1928 को कांग्रेस मंच पर व्याख्यान दिया। अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में सक्रिय भूमिका निभाई। हरियाणा की किसी भी बड़ी पंचायत में उनका पहुँचना अनिवार्य समझा जाता था।

जीवन उद्देश्य और विरासत

गोरक्षा, स्वदेश प्रेम, आर्यसमाज की उन्नति, किसानों का सुधार— यही उनका जीवन उद्देश्य रहा। उनका सारा जीवन परोपकार, निडरता और सेवा के लिए समर्पित था।


👉 इस प्रकार चौधरी पीरुसिंह जी केवल आर्यसमाज ही नहीं, अपितु हरियाणा और भारत की धरती के एक महान समाजसुधारक, गोभक्त, त्यागी और स्वतन्त्रता सेनानी थे।