विद्वान् ब्रह्मचारी पं० विक्रम जी
गुरुकुल झज्जर में आगमन
जब नवम्बर १९४२ दीपमाला के अवसर पर मैंने सेवार्य गुरुकुल झज्जर को “पूज्य स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज” गुरुकुल झज्जर के आचार्य की प्रेरणा वा आग्रह पर संभाला, तो स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज ने मेरी सहायता के लिए “ब्र० विक्रम जी” को भेज दिया। वे गुरुकुल कांगड़ी के बड़े सुयोग्य विद्वान् और विरक्त स्नातक थे।
विद्वता और स्वभाव
वे व्याकरण और साहित्य के अच्छे पंडित थे। उनका स्वभाव बड़ा सरल था। वे बहुत ही त्यागी, तपस्वी ब्रह्मचारी थे तथा खिलाड़ी भी प्रथम कोटि के थे। वे स्वामी ब्रह्मानन्द जी के भानजे थे और उन दिनों गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में अध्यापक थे। स्नातकोपरान्त उनकी यही दृढ़ प्रतिज्ञा थी कि—
“मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहकर आर्यसमाज तथा गुरुकुलों की सेवा करूँ।”
दुर्भाग्यपूर्ण घटना
वे गुरुकुल झज्जर में मेरी सहायतार्थ एक-दो मास ही आये थे। एक दिन सायंकाल शौच एवं भ्रमणार्थ जंगल में चले गये। लौटते समय जोर से वर्षा हो गई। सर्वत्र जल भर गया। वर्षा के कारण भूमि के गर्भ में गर्मी होने से एक विषैला सर्प निकल आया और ब्रह्मचारी के पैर पर काट गया।
उपचार का प्रयास
वे मस्त ब्रह्मचारी थे। उसकी परवाह न करके अपने स्वभावनुसार कुछ देर से गुरुकुल लौट आये। उनके पैर से सर्प-दंशित स्थान से रक्त खूब निकल रहा था। हमने विष दूर करने के लिए उन्हें घृत पीने को कहा। बहुत आग्रह करने पर उन्होंने थोड़ा-सा ही घृत पिया। हरियाणा में घृतपान को सर्पविष की अच्छी चिकित्सा माना जाता है।
ग्राम से एक सर्पविष चूसने वाला बुलाया गया, जिसने विष चूसने का प्रयास किया। स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज को तत्काल शाहदरा से बुलाया गया। उन्होंने भी औषध दी, पर कोई लाभ न हुआ। कांगड़ी से ब्र० विक्रम जी के मामा के लड़के श्री डॉ० अनन्तानन्द जी को चिकित्सार्थ बुलाया गया, किन्तु सब व्यर्थ गया।
अकाल वियोग
अन्ततः इंजेक्शन देते समय ही उनकी मृत्यु हो गई। यह समाचार सबके लिए अत्यन्त आघातकारी था।
अत्यन्त योग्य, विद्वान्, त्यागी, तपस्वी ब्रह्मचारी युवावस्था में ही हम सबको छोड़कर चले गये। विवशता थी—प्रभु की इच्छा के आगे किसकी चलती है।
आना-जाना तो जगत का नियम है, परन्तु जिसके समान का पूरक न हो, उसका जाना सबको खटकता है और यही दुःख का कारण बनता है।
वीर ब्रह्मचारी पं० हरिशरण जी
शिक्षा व सेवा
गुरुकुल दयानन्द बाग शेरसा रोहतक तथा गुरुकुल बुकलाना जि० मेरठ में सेवा तथा अध्ययन भी किया। इनकी शास्त्रार्थ करने तथा देखने में बहुत ही रुचि थी। इस लग्न में बाइबल तथा कुरान का भी अध्ययन किया। बाइबल का तो वह आचार्य बन गया। अच्छे-अच्छे पादरियों को चुनौती देकर शास्त्रार्थों में इन्होंने हराया।
शुद्धि कार्य
ईसाइयों की शुद्धि भी की, महाराष्ट्र बारानती तथा शिमडेगा बिहार आदिवासियों में ईसाइयों को शुद्ध करने के लिये बहुत वर्ष कार्य किया।
वीरता और संगठन
इस वीर ने हिन्दू-मुस्लिम झगड़े में बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य हिन्दुओं की रक्षार्थ किया। वह लाठी, भाला, तलवार, बन्दूक, पिस्तौल आदि अस्त्र-शस्त्र चलाने में निष्णात था। “आर्य वीर दल” शिविर लगाकर सहस्रों वीरों को प्रशिक्षण दिया। वह इतना निर्भीक और वीर साहसी था कि अकेला ही सहस्रों का मुकाबला करने के लिए मैदान में कूद पड़ता था। न जाने कितनी बार उसने डटकर इस प्रकार लाठी आदि से युद्ध किया, कई गुंडे उसके हाथों परलोक सिधारे। वह सच्चा क्षत्रिय था, मृत्यु के साथ खेल करता था। चलता-चलता लड़ाई मोल ले लेता था। अन्याय को वह सहन नहीं कर सकता था। इस प्रकार का वीर युवक मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा।
जीवनचर्या
वह बहुत वर्ष मेरे साथ रहा, बहुत ही कर्मठ था, रात्रि-दिवस कार्य करता, वह थकता नहीं था। आराम को वह हराम समझता था। उसकी सबसे प्यारी वस्तु शस्त्र और सबसे प्रिय कार्य लड़ना। मैंने अनेक बार अपनी आँखों से उसे वीरतापूर्वक दुष्टों से लड़ते देखा। भयंकर कार्य करने में उसे बड़ा आनंद आता था। हमारे पूर्वज कहते आए हैं कि— मुसीबत (दुःख) को बुलाना नहीं चाहिए, आ जाए तो घबराना नहीं चाहिए। किन्तु वह तो मुसीबत (दुःखों) को निमंत्रण देकर बुलाता और फिर उनसे खूब टकराता था और भयंकर से भयंकर आपत्ति में भी वह नहीं घबराता था।
संघर्ष और निर्भीकता
उसे सन् १९४७ में गोली लगी, जो उसके फेफड़े को पार करके कमर से निकल गई थी। स्वयं ही पट्टी बाँधकर मारोत ग्राम में पड़ा रहा। मैं उसे अस्पताल में ले जाने के लिए मोटर गाड़ी लेकर गया तो उसने स्पष्ट निषेध कर दिया और कहा— मैं यहीं अच्छा हो जाऊँगा। मैं यदि अस्पताल में भरती हुआ तो आप पर (लेखक पर) कोई नई मुसीबत आ जाएगी। मेरी मुसीबत का तो उसे ध्यान था किन्तु अपनी जान (प्राणों) की उसे कोई चिंता नहीं थी। वहीं डॉक्टर भेजकर मैंने उसकी मरहम-पट्टी करवाई। अगले दिन समझा-बुझाकर उसे बेरी के अस्पताल में चिकित्सार्थ भरती करवाया। डॉक्टर अपना बहुत प्रेमी था। उसने जान से बचाने की पूरी कोशिश की। एक दिन डॉक्टर ने कहा— गोली ऐसी लगी है कि इसका बचना बहुत मुश्किल है। वह उसी समय हँसकर निर्भीकता से बोला— मैं इस समय मर ही नहीं सकता। कुछ समय पश्चात् अच्छा होकर कार्यक्षेत्र में आ कूदा।
आर्य समाज सेवा
उसने गुरुकुल झज्जर की भी बहुत सेवा की। गुरुकुल ने भी उसके सेवा-कार्य में सभी उपयुक्त साधन सामग्री जुटाई। वह हैदराबाद आर्य सत्याग्रह में जेल में प्रारम्भ से अंत तक मेरे साथ रहा। हिन्दी सत्याग्रह पंजाब में भी कार्य खूब किया तथा जेल में भी पहुँच गया। उसने अपने जीवन में खूब बढ़-चढ़कर कार्य किया।
साधन-संयम
वह लवण, मिर्च, मीठा बिल्कुल नहीं खाता था। जैसा मिलता वैसा खाकर संतुष्ट रहता। हाँ, दूध मिलने पर खूब खाता था, देखने वाले आश्चर्य करते थे।
साँपों से सम्बन्ध
उसमें एक भयंकर दोष था— उसकी वीरता मूर्खता का रूप धारण कर लेती थी। वह जब किसी साँप को देखता तो उसे पकड़ लेता था वा मार देता था। साँपों का शत्रु था और मित्र भी। उसने अपने आश्रम शिमडेगा (बिहार) में बहुत से साँप पकड़कर हांडियों में पाल रखे थे। मैंने उसे बहुत बार मना किया कि तुम साँप मत पकड़ा करो, कभी साँप के काटने से ही प्राण खो बैठोगे। हुआ भी यही— उसने एक भयंकर विषैले सर्प को पकड़कर अपने गले में डाल लिया और व्याख्यान देने लग गया। साँप के विषैले दाँत भी वह नहीं तोड़ता था। उसे साँप ने दो बार काटा। वह सर्पविष की एक अच्छी औषध भी जानता था, जिसे वह चिकित्सा में प्रयोग करता था। बहुत से सर्पदंश के रोगी उसने बचाए थे।
मृत्यु
किन्तु उस दिन उसकी मौत आ गई। औषध उसने खाई भी, उसकी वमन हो गई और दूसरा साथी उस समय संभालने वाला भी नहीं था। कुछ घण्टे पश्चात् यह अद्वितीय वीर मृत्यु की गहरी निद्रा में सदा के लिये सो गया।
शोक
जब इसकी मृत्यु का समाचार मुझे मिला तो मैं हक्का-बक्का रह गया। इस दुख को मिटाने के लिए मैं कुछ दिन के लिए जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर चला गया। ऐसे वीर साथियों को खोकर मैं अकेलापन अनुभव करने लगा। ऐसा मित्र, साथी, सहयोगी आज कहाँ है? ईश्वरेच्छा बलीयसी। विस्तार से फिर कभी लिखूँगा।
ब्रह्मचारी नरदेव जी का जीवन प्रसंग
(गुरुकुल झज्जर के होनहार ब्रह्मचारी)
नरदेव जी, जो अत्यंत होनहार और तेजस्वी ब्रह्मचारी थे, का जन्म दिल्ली के ग्राम मादीपुर में एक अहीर क्षत्रिय कुल में हुआ था। उनके पिता धर्मनिष्ठ और धार्मिक शिक्षा के प्रेमी थे। उन्होंने अपने इस योग्य पुत्र को प्रारंभ से ही वैदिक संस्कारों से युक्त शिक्षा देने का निश्चय किया और उसे गुरुकुल झज्जर में अध्ययन हेतु भेजा।
गुरुकुल में ब्रह्मचारी नरदेव जी का अध्ययन अत्यंत उत्तम था। वे शीघ्र ही स्नातक बनने वाले थे, किंतु दुर्भाग्यवश उस समय मोटी ज्वर (टाइफाइड) का प्रकोप गुरुकुल में फैला, जिससे लगभग २५ से ३० ब्रह्मचारी पीड़ित हो गए। नरदेव जी भी इस रोग से ग्रसित हुए, परंतु प्रारंभिक चिकित्सा से वे कुछ दिन में स्वस्थ हो गए। किंतु कुछ समय पश्चात् वही रोग पुनः अत्यंत तीव्र वेग से उन पर आक्रमण कर बैठा।
गुरुकुल में चिकित्सा हेतु वैद्य और डॉक्टरों का पूरा प्रयास चलता रहा। डा० इन्द्रजीत जी, वैद्य बलवन्तसिंह जी तथा वैद्य बलराम जी आदि निरंतर सेवा में लगे रहे, परंतु सभी उपाय निष्फल रहे।
उसी दिन कुण्डली ग्राम में बूचड़खाने को हटाने के संबंध में एक बैठक आयोजित थी, जिसमें लेखक (गुरुकुल के प्रबंधक या अध्यापक) को जाना पड़ा। जाते समय ब्रह्मचारी नरदेव जी की स्थिति गंभीर थी। मन में चिंता थी कि वापसी तक न जाने क्या स्थिति हो। बैठक समाप्त कर जब लेखक शीघ्रता से गुरुकुल लौटे, तो मार्ग में ही सूचना मिली —
“एक ब्रह्मचारी का देहांत हो गया और दूसरे की अवस्था भी गंभीर है।”
यह सुनते ही लेखक का मन आशंका से भर उठा और वह समझ गए कि उनका प्रिय शिष्य, ब्रह्मचारी नरदेव, अब नहीं रहे।
सायंकाल तक उनके पिता-माता भी गुरुकुल पहुँच गए। जब माता जी ने अपने पुत्र का मृत शरीर देखा तो उनका दुःख असहनीय था। वे विलाप करती रहीं, परंतु शांति नहीं पा सकीं। सभी गुरुजन, ब्रह्मचारी और परिजन अत्यंत दुखी थे।
गृहस्थों ने यह निर्णय लिया कि मृत शरीर को घर न ले जाकर गुरुकुल के समीप ही कुलभूमि में संस्कार करना उचित होगा। अतः वहीं अत्यंत श्रद्धा और वैदिक विधि से उनका अंत्येष्टि संस्कार किया गया।
यह ब्रह्मचारी क्षत्रिय प्रकृति का था। उसे शस्त्र और व्यायाम में विशेष रुचि थी। वह चाकू, लाठी, गुप्ती आदि रखता और आसन-व्यायाम नियमित करता था। साथ ही वह सेवा-भाव से ओतप्रोत था और गुरुकुल के प्रत्येक कार्य में श्रद्धापूर्वक सहभागी रहता था।
उसका भविष्य अत्यंत उज्ज्वल था। उसका एक चित्र शीर्षासन करते हुए लिया गया था, जो आज भी गुरुकुल में सुरक्षित है।
उनके पिता जी आज भी धर्मपरायण हैं और सदा शुभ कार्यों में दान देते रहते हैं। उन्होंने कई बार गुरुकुल झज्जर को भी सहयोग दिया। उनकी यह हार्दिक इच्छा थी कि उनका पुत्र नरदेव विद्वान बनकर देश और धर्म की सेवा करे, किंतु विधाता को कुछ और ही मंजूर था।
नरदेव जी की मृत्यु के पश्चात् उन्होंने अपने छोटे पुत्र वेदपाल को भी गुरुकुल में भेजा, परंतु उसका मन वहाँ स्थिर नहीं हो सका। आज भी पिता जी के हृदय में यह दुःख है कि उनका होनहार पुत्र असमय काल के ग्रास में चला गया।
ब्रह्मचारी नरदेव का जीवन अल्पकालिक होते हुए भी तेज, संयम, परिश्रम, श्रद्धा और सेवा से युक्त था। वे आर्य समाज और गुरुकुल परंपरा के सच्चे प्रतिनिधि थे।
ब्रह्मचारी विद्याव्रत जी
श्री प्रो० राजेन्द्रकुमार जी जिज्ञासु, शोलापुर डी० ए० वी० कॉलेज में अध्यापक थे। ये भी अपनी धुन के घनी हैं। इनके मन में यह खटक रहा था कि महाराष्ट्र में संस्कृत के पंडित, आर्यसमाजी विद्वान् बहुत ही न्यून हैं, और वे भी दिन प्रतिदिन घटते ही जा रहे हैं। उन्होंने वहां अपने उपदेशों से कुछ गृहस्थों को प्रेरणा देकर लगभग १० ब्रह्मचारी गुरुकुल झज्जर में विद्या अध्ययनार्थ भिजवाये।
उनमें से कुछ विद्यार्थी कुछ काल तक गुरुकुल में पढ़ते रहे। उनमें एक होनहार ब्रह्मचारी विद्याव्रत था। वह पढ़ने में भी अच्छा, स्वभाव से सुशील और व्यायामप्रिय था। थोड़े दिनों में ही वह पढ़ने तथा बढ़ने में अग्रसर होने लगा। अच्छे ब्रह्मचारियों के समान उसका शरीर सुन्दर, सुरढ़ और सुगठित हो गया।
“होनहार बिरवान के होत चीकने पात”
इस कहावत के अनुसार वह अपने गुणों के कारण सबके मन को मोह लेता था। बहुत ही अच्छा ब्रह्मचारी था। कुलवासियों की आशाओं का केन्द्र बना हुआ था।
अकस्मात् बज्रपात हो गया। वह भी मोटी ज्वर (टाइफाइड) के रोग से ग्रस्त हुआ और ज्यों-ज्यों चिकित्सा की, रोग बढ़ता ही गया। आराम होने की आशा नहीं रही। ब्रह्मचारी नरदेव की मृत्यु के पश्चात् उसको वैद्य रामस्वरूप जी आयुर्वेदालंकार ने देखकर औषध दी। हम सब चिकित्सा कर ही रहे थे। अपने प्रिय डा० सोमबीर के परामर्श से मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में भरती करा दिया।
उसकी कई दिन वहां चिकित्सा होती रही — ग्लूकोज़ और खून भी चढ़ाया गया, ऑक्सीजन गैस भी दी गई, किन्तु सब व्यर्थ हो गया। वैद्य भरतसिंह (रोहतक) ने अपना रक्त भी दिया। सब कुछ करने पर भी हम उसे बचा नहीं सके।
“टूटी की बूटी नहीं, मौत का नहीं इलाज।”
वह होनहार ब्रह्मचारी शरीर छोड़कर चला गया। कई दिन पूर्व उसके पिता भी पहुँच गये थे।
श्री दयानन्द मठ में वैदिक रीति से उसका अन्त्येष्टि संस्कार कर दिया गया।
ब्रह्मचारी बृहस्पति जी (रामकृष्ण)
ग्राम भदानी, तहसील झज्जर, जिला रोहतक (हरियाणा प्रदेश) एक बड़ा उत्साही तथा उन्नतिशील ग्राम है। यह ग्राम सभी कार्यों में सदैव अग्रसर रहता है। शिक्षा की दृष्टि से भी रोहतक जिले में यह ग्राम आगे है। कन्याओं का हाई स्कूल तथा बालकों का स्कूल इस ग्राम में अलग-अलग दोनों ही हैं। धार्मिक प्रवृत्ति वाला यह ग्राम सह-शिक्षा से घृणा करता है। यहाँ आर्यसमाज पहले से ही स्थापित है और उसका अच्छा प्रचार भी है। इसी कारण यह ग्राम आर्यसमाज के सभी कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेता है।
इस ग्राम के अनेक विद्यार्थी गुरुकुल झज्जर में पढ़ते रहे हैं तथा अब भी पढ़ रहे हैं। यह ग्राम सैनिकों का ग्राम कहा जा सकता है क्योंकि यहाँ अनेक बड़े-बड़े फौजी अफसर हैं। झज्जर तहसील में अधिकांश ग्राम इसी प्रकार सैनिकों से भरे हैं।
इसी ग्राम में एक सैनिक परिवार चौ० हरफूल सिंह जी आर्य का है। वे तीन भाई हैं और तीनों ही सेना में सेवा कर चुके हैं। म० हरफूल सिंह के तीन पुत्र हुए —
- प्रो० ईश्वर सिंह देशवाल, जो झज्जर कॉलेज में प्राध्यापक हैं। उन्होंने परिवार की परंपरा के अनुसार एन०सी०सी० में ऊँचे से ऊँचा प्रशिक्षण प्राप्त किया।
- दूसरा पुत्र रोगी होकर स्वर्गवासी हो गया।
- तीसरा पुत्र रामकृष्ण, जो गुरुकुल झज्जर में शिक्षा प्राप्ति हेतु प्रविष्ट हुआ।
यह शरीर से बहुत हृष्ट-पुष्ट, सुंदर और सुडौल था। गुरुकुल झज्जर में इसका नाम ब्रह्मचारी बृहस्पति रखा गया। इसे पढ़ने में रुचि बहुत न्यून थी। कुछ काल तक शिक्षा पाने के पश्चात् यह कुल-परंपरा के अनुसार सेना में भर्ती हो गया।
जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ, तब यह वीर रामकृष्ण रणभूमि में वीरतापूर्वक लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुआ। उस समय यह यौवन की प्रथम अवस्था में था। पहले तो इसने गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की, कुछ ही काल बाद सैनिक बना, और शीघ्र ही यह देशभक्त शहीद हो गया।
इसने अपने जीवन में किसी प्रकार का सांसारिक सुख नहीं भोगा। भरी जवानी में प्रभु का प्यारा हो गया। यह युवक बड़ा होनहार, उत्साही, धार्मिक और सुशील था। सदैव हँसता रहता था, बड़ा ही खुशदिल था। किसे ज्ञात था कि वह इतना शीघ्र, यौवन में ही संसार से विदा हो जाएगा! इसके यौवन की कली खिलने ही लगी थी, कि पूर्ण विकसित होने से पूर्व ही मुरझा गई।
सारे परिवार को इसके देहांत से गहरा आघात पहुँचा। किन्तु इसके बड़े भाई प्रो० ईश्वर सिंह जी तथा इसके पिता चौ० हरफूल सिंह जी आर्य ने इस वज्रपात को बड़े धैर्य और बुद्धिमत्ता से सहन किया। सामान्य लोग तो यह भी नहीं जान सकते थे कि इन्हें अपने प्रिय पुत्र और भाई की अकाल मृत्यु का कितना दुःख हुआ होगा।
माता जी, बहनों तथा अन्य पारिवारिक जनों को जो कष्ट हुआ, वह अकथनीय है। परंतु इस दुःख को इस परिवार ने अपनी धार्मिक भावना और देशभक्ति के रूप में रूपांतरित कर लिया।
प्रत्येक वर्ष अपने ग्राम में श्री रामकृष्ण जी के बलिदान दिवस को “शहीदी मेला” के रूप में मनाया जाने लगा। इसमें पास-पड़ोस की जनता अच्छी संख्या में आती थी। अनेक राजनीतिक नेता और धार्मिक नेता भी आकर देशभक्ति और धर्मोपदेश के भाषण करते थे। यह शहीदी मेला कई वर्षों तक चालू रहा। लेखक भी प्रतिवर्ष इसमें भाग लेता रहा।
इनके भाई प्रो० ईश्वर सिंह जी, अपने पिता चौ० हरफूल सिंह जी आर्य के समान बड़े उत्साही, दानी और धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले व्यक्ति हैं। वे आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा के अंतरंग सदस्य हैं और अपने परिवार की धार्मिक तथा देशभक्ति की परंपरा को बनाए हुए हैं।
श्री रामकृष्ण जी ने देश पर अपना बलिदान देकर अपने ग्राम, प्रांत, परिवार तथा गुरुकुल झज्जर की कीर्ति को चार चाँद लगा दिए।
उनका तथा उनके परिवार का यश और कीर्ति सदा फैलती रहे — यही परमात्मा से प्रार्थना है।
इसी प्रकार हमारे और भी अनेक ब्रह्मचारी हुए हैं जो अपने विद्यार्थी जीवन में ही भगवान के प्यारे हो गए।
महाशय उदमीराम जी, ग्राम गुरावड़ा, तहसील रिवाड़ी के बड़े ही धार्मिक आर्य पुरुष थे। उन्होंने सारी आयु आर्यसमाज की सेवा में बिताई, महर्षि दयानन्द के कर्मठ सैनिक बनकर कार्य किया। अपनी शक्ति के अनुसार गुरुकुलादि संस्थाओं को दान देते रहे। वे अपनी संतानों को भी वैदिक धर्म और आर्यसमाज के सेवक बनाना चाहते थे।
इसीलिए उन्होंने अपने ग्राम में आर्यसमाज के उत्सव तथा प्रचार कार्य करवाए। अपने एक प्रिय पुत्र को गुरुकुल झज्जर में शिक्षा प्राप्ति हेतु प्रविष्ट कराया। वह कई वर्षों तक विद्याध्ययन करता रहा।
एक बार अकस्मात् वह रोगग्रस्त हुआ, और सब प्रकार की चिकित्सा करने पर भी ठीक नहीं हो सका। शीतांग सन्निपात से उसकी मृत्यु हो गई।
उस होनहार विद्यार्थी के प्रति जो आशाएँ उसके माता-पिता और गुरुकुल परिवार ने लगाई थीं, वे सब उसकी मृत्यु से निराशा में बदल गईं।
महाशय उदमीराम जी अपने दूसरे पुत्र को भी गुरुकुल में पढ़ाना चाहते थे, किन्तु घर वालों ने उनकी यह इच्छा पूरी नहीं होने दी।
महाशय धर्मपाल जी के सुपुत्र
रिवाड़ी तहसील, जिला महेन्द्रगढ़ में स्थित एक प्रसिद्ध ग्राम नूरगढ़ है। यह ग्राम आर्यसमाज की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ आर्यसमाज के प्रसिद्ध संन्यासी स्वामी सोमदेव जी महाराज निवास करते थे, जो चिकित्सा के माध्यम से जनता की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने इस ग्राम में अपना आश्रम स्थापित किया और एक सुंदर तालाब भी बनवाया।
स्वामी सोमदेव जी महाराज श्री दयानन्द उपदेशक विद्यालय, लाहौर के स्नातक थे तथा आर्यसमाज के प्रसिद्ध वीर संन्यासी स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज के सुयोग्य शिष्य थे। स्वामी सोमदेव जी के प्रभाव से नूरगढ़ ग्राम में आर्यसमाज का उत्कृष्ट प्रचार हुआ। इसी कारण यहाँ अनेक अच्छे आर्य कार्यकर्ता और भजनोपदेशक उत्पन्न हुए।
इन्हीं कार्यकर्ताओं में से एक थे महाशय धर्मपाल जी आर्य, जो भजनोपदेशक के रूप में आर्यसमाज की सेवा करते थे। वे अपने पुत्र को एक सुयोग्य विद्वान् एवं आर्यसमाज का सेवक बनाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने पुत्र को गुरुकुल झज्जर में शिक्षा के लिए प्रविष्ट कराया।
यह बालक अत्यंत होनहार, चंचल, और तेजस्वी विद्यार्थी था। कई वर्षों तक उसने गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त की।
एक दिन दुर्भाग्यवश वह गुरुकुल की मशीन वाली चक्की के कमरे में चला गया। वहाँ चक्की चल रही थी और आटा पीसा जा रहा था। वह बालक एक बोरी लेकर खेलने लगा। अचानक वह बोरी के साथ मशीन के चक्कर में फँस गया और बुरी तरह घायल हो गया।
उसके हाथ-पैर की कई हड्डियाँ टूट गईं और शरीर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया। तत्काल उसकी प्राथमिक चिकित्सा की गई और शीघ्र ही रोहतक मेडिकल कॉलेज ले जाने की व्यवस्था की गई, परंतु मार्ग में ही उस बालक की मृत्यु हो गई।
इस दुर्घटना से पूरा गुरुकुल परिवार शोकाकुल हो गया। सभी कुलवासी अत्यंत दुःखी हुए। फिर भी वैदिक परंपरा के अनुसार गुरुकुल में ही अंत्येष्टि संस्कार किया गया।
बालक के माता-पिता भी इस संस्कार में सम्मिलित हुए। यह घटना इतनी आकस्मिक थी कि सभी के हृदयों में शोक और संवेदना की लहर दौड़ गई।
यह कली, जो अभी फूल बनने से पूर्व ही मुरझा गई, सबके सपनों को अधूरा छोड़ गई।
किन्तु इसके पिता श्री धर्मपाल जी ने इस दुःखदायी घटना को अत्यंत धैर्य और संयम से सहन किया। उन्होंने अपनी श्रद्धा और निष्ठा को विचलित नहीं होने दिया।
उनकी आज भी यही इच्छा है कि अपने दूसरे पुत्र को गुरुकुल में पढ़ाकर आर्यसमाज का कर्मठ सेवक बनाएं।
हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि वे महाशय धर्मपाल जी पर अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखें और उनके परिवार को धर्ममार्ग पर दृढ़ रखें।
— यह होनहार ब्रह्मचारी आर्यसमाज के इतिहास में एक अमिट स्मृति बन गया।










