भुवनेश भारत देश का बेड़ा मझधार है
भुवनेश भारत देश का बेड़ा मझधार है
कर दो बेड़ा पार बार-बार ये पुकार है
विद्या बल में भूमण्डल में गुरु माने जाते थे
इसी लिये नित्य विदेशी, विद्या पढ़ने आते थे
दुनिया के महान व्यक्ति हमको शीस झुकाते थे
हमारे चरणों की धूल मस्तक पर लगाते थे
विद्वता की जगह आज पागलपन सवार है।।1।।
दुनियां को खिलाने वाले के खाने में भंग है
समृद्धशाली देश आज हर वस्तु से तंग है
हाथ पैर शीस कटे छिन्न भिन्न अंग है
उमंगों की तरंगों का रंग भदरंग है
एक मां के जाये भाईयों, में भी नहीं प्यार है।।2।।
धर्म नहीं कर्म नहीं श्रद्धा और विश्वास नहीं
सत्य प्रेम शील सदाचार का प्रकाश नहीं
धीरता ना वीरता उदारता और साहस नहीं
अब तक तो बच रहे, आगे वचन की आस नहीं
बैठा हुआ ढेर पर, बारूद के संसार है।।3।।
तेरे बिना ईश्वर हमारा कोई और ना
दुनियां में ले जिसका सहारा कोई ठौर ना
जिसको भगवन तुमने विसारा कोई गौर ना
उसके लिये जग में अंधियारा कोई और ना
शोभाराम प्रेमी का सहारा सरजन हार है।।4।।










