भूमिमात

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उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा अस्मभ्यं सन्तु पृथिवि प्रसूताः ।

दीर्घ न आयुः प्रतिबुध्यमाना वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम

।। अथ. १२.१.६२

तर्जः माटीतुन जन्ममाझा

भूमिमातः ! पुत्र हैं तेरे दिया तूने जन्म रे
तेरी सेवा में होवे ये जीवन धन्य रे॥
॥ भूमिमातः॥

मिली देह, माता तेरे ही रजकणों से
गोद में झुलाओ झूले मातृसुखों के
खिला-पिला आश्रय देती, माँ तू अनन्य रे॥
॥ भूमिमातः ॥

अन्न जल वायु औषध देती धन-मान रे सुख,
समृद्धि, रक्षा, विद्या का दान दे।
उपकार प्यारी माते! तेरे अनन्त दे॥
॥ भूमिमातः ॥

दुःख भय रोग हटाकर, बल स्वास्थ्य पुष्टि दे
आत्मिक उन्नति कर दे, मेघावी बुद्धि से
भोग्यरूप दुग्ध-दोहन से होते सब सम्पन्न रे॥
॥ भूमिमातः॥

होवे उन्नति शारीरिक भोगें हम पूर्णायु
प्रतिबुध्यमान होवे, हो जायें मनायु
तेरा मातृत्व का माते ! चढ़ता जाये रंग रे॥
॥ भूमिमातः ॥

तुझसे मिली देह आयु प्राण पुष्टि धन रे
वक्त आये सब कुछ कर दें तेरे अर्पण रे
दूध की कीमत चुके या हो मृत्यु से विबन्ध रे॥
॥ भूमिमातः॥

(अनन्य) सबसे अलग। (रज) धूल। (प्रतिबुध्यमान) पूर्णरूप से उन्नति प्राप्त। (मनायु)
मननशील। (विबन्ध) आलिंगन ।