● श्रुति-वचन ●
- स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिण: । प्र-प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥
(यजुर्वेद : 11.83)
अन्नपते । अन्नस्य । नः । देहि । अनमीवस्य । शुष्मिणः। प्र-प्र। दातारम् । तारिषः । ऊर्जम् । नः । धेहि । द्विपदे । चतुष्पदे ।
अर्थ –
(अन्नपते) अन्नों के स्वामिन्, हे प्रभो !
(अनमीवस्य) रोग से रहित और सुखकर
(शुष्मिणः) और अत्यन्त बल देने वाले
(अन्नस्य) अन्न का
(नः) हमारे लिए
(प्र-प्र देहि) बहुत-बहुत सा दान दो, और
(दातारं) जो हमें अन्न दे रहा है, उस दाता को
(तारिषः) दु:खों से तार दो।
(नः) हमारे लिए और
(द्विपदे) समस्त मनुष्य और दो पैर के पक्षियों के लिए, एवं
(चतुष्पदे) गाय, घोड़े आदि सभी ग्राम्य पशुओं के लिए
(ऊर्जं) शारीरिक ऊर्जा, ओज, तेज, बल और सामर्थ्य
(धेहि) धारण कराइये।
इस मन्त्र का विनियोग अन्नप्राशन संस्कार में भी कराया गया है । इस मन्त्र को पढ़कर भोजन प्रारम्भ करने की प्रथा भी कुछ वषों से हाल में ही चल पड़ी है । – सत्यप्रकाश
[स्रोत : प्रभु के मार्ग पर, पृ. 80-81, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]
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