भेंट का अभाव

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१ २३ १२३२३१ २२१ २२१२१३१२११२ प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उच्यते।

भृतिं न भरा मतिभिर्जुजोषते ।। साम. ५७३. ऋ.६.१०३.१

तर्जः बाँध प्रीत-फूल डोर मन लेके…

दया दृष्टि मेरी ओर,
कर, प्रभु चित्तचोर, दूर जाना ना (३)
ना ही कोई दूजा ठोर,
जिसपे करूँ मैं गौर, दूर जाना ना (3)
॥ दया दृष्टि…

मन की किवड़िया दी है, प्रभु तेरे लिए खोल
प्रीत से पधारो प्रभु! मीत मेरे अनमोल
भूल जाना ना, भूल जाना ना
भूल जाना ना, भूल जाना ना ॥
॥ दया दृष्टि…

हृदय रहा मेरा बोल, तरंगों में आ के डोल
आत्म-चित्त मन-वाणी से, रस ओ३मामृत घोल
आके, जाना ना, आके जाना ना
आके जाना ना, आके जाना ना
॥ दया दृष्टि…

जगत में जो भी देखा, सब तेरा दयानिधे !
एक आत्मा ही है जो, करूँ अर्पण तुझे,
दरस दीवाना, मैं दरस दीवाना
दरस दीवाना, मैं दरस दीवाना।
॥ दया दृष्टि…

ग म ग रे सा ध नी रे सा ना ही को ई ….
ग म म नी ध नी सा
ध नी रे सा, सा नी ध प म ग
म ग रे सा ध नी रे सा