भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
ओ३म् तव॑ श्रि॒या सु॒दृशो॑ देव दे॒वाः
पु॒रू दधा॑ना अ॒मृतं॑ सपन्त ।
होता॑रम॒ग्निं मनु॑षो॒ नि षे॑दुर्दश॒स्यन्त॑
उ॒शिज॒: शंस॑मा॒योः ॥
ऋग्वेद 5/3/4
भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
याज्ञिक आत्मा हुई विभासित
सत्यासत्य के जानो भेद
आत्मा भिन्न है, भिन्न है देह
शरीर विषयों से जो विरक्ति
यही वैराग्य की वृत्ति
भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
शम, दम, उपरति, श्रद्धा, तितिक्षा,
समाधान ये षटक सम्पत्ति
श्रवण मनन निदिध्यासन दर्शन
प्राप्त करायें मुक्ति
भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
ईश उपासना शुक्ल कर्म सब,
धारण कर मिलती है मुक्ति
करें भक्ति जो जगन्नायक की
पायें अमृत तृप्ति
भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
जब तक जीव को जग का बन्धन,
कर्म अनुसार है सुख दु:ख क्रन्दन
आनन्द मिले ना आसक्ति से,
रहे ग्रस्त दुर्गति
भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
परम तत्त्वदर्शी ऋषि योगी,
आत्मा की शोभा को वरते
बोध कराते मुक्ति मार्ग का,
बनते आत्म सुदर्शी
भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
तेज आन्तरिक आत्माओं का
महात्माओं को प्रभु है देता
ब्रह्मलोक के आश्रित कर प्रभु,
देते मोक्ष की सिद्धि
भीतर अनन्त प्रकाश प्रकाशित
रचनाकार :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
स्वर :- श्रीमती अदिति जी शेठ*
शीर्षक :- तत्त्वदर्शी तेरी शोभा से अमृत धारते हैं
तर्ज :- भीतर अनन्त, प्रकाश-343
विभासित = ज्योतिर्मान
शम = अपनी आत्मा और अन्तःकरण को धर्माचरण में प्रवृत्त कराना
दम = कर्मेन्द्रियों को व्यभिचार आदि कुकर्मों से बचाकर जितेन्द्रियत्वादि शुभकर्मों से प्रवृत्त रखना
उपरति = दुष्ट कर्मों वाले मनुष्य से सदा दूर रहना
श्रद्धा = वेदादि सत्य शास्त्रों और उनके बोध से पूर्ण आप्तविद्वान् सत्य उपदेष्टा महानुभावों के सत्यवचनों को मानना
तितिक्षा = चाहे निन्दा स्तुति लाभ हानि क्यों न हो किन्तु हर्ष शोक छोड़, मुक्ति साधनों में लगे रहना
समाधान = चित्त की एकाग्रता
वृत्ति = स्वभाव
तृप्ति = सन्तोष
ग्रस्त = पकड़
शुक्ल = निर्दोष, पवित्र
आसक्ति = लगाव
दुर्गति = विपत्, नरक
तत्त्वदर्शी = तथ्यों को जानने वाला, दार्शनिक
बोध = ज्ञान
सुदर्शी = सुन्दर विचारशील
सिद्धि = मुक्ति
वैराग्य = स्वार्थ मूलक प्रवृत्तियों का त्याग










