ओ३म् प्र꣡ सो अ꣢꣯ग्ने꣣ त꣢वो꣣ति꣡भिः꣢ सु꣣वी꣡रा꣢भिस्तरति꣣ वा꣡ज꣢कर्मभिः ।
य꣢स्य꣣ त्व꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मावि꣢꣯थ ॥१०८॥
सामवेद 108
भवसागर दु:ख से
हे प्रभु ! हम तरना चाहें
सत्प्रेरणाएँ तेरी पाते ही जाएँ
आश्रय तेरा मिलता रहे
काम, क्रोध, मद मोह से बचाकर
मन-आत्मा देहबल को बढ़ा दे
तेरी रक्षा का पात्र बनाकर
हमको सात्विक-सखा बना ले
तेरे गुण कर्म और स्वभाव की
प्रेरणायें मिलती रहें
भवसागर दु:ख से
हे प्रभु ! हम तरना चाहें
सत्प्रेरणाएँ तेरी पाते ही जाएँ
आश्रय तेरा मिलता रहे
भवसागर दु:ख से
आत्मेन्द्रिय, बुद्धि, देह, मनोबल
बनने ना दें जीवन को दुर्बल
वीर-सुवीर गुणों से सजा दो
प्रथित प्रकाश से कर दो प्रज्जवल
रङ्ग दो आत्मा अपने ही रङ्ग में
बाँधव बन के बाँह थामें
भवसागर दु:ख से
हे प्रभु ! हम तरना चाहें
सत्प्रेरणाएँ तेरी पाते ही जाएँ
आश्रय तेरा मिलता रहे
भवसागर दु:ख से










