नौ वृष्टिं दिवस्पर स नो॒ वाज॑मन॒र्वार्णम् स नंः सहस्रिणीरिषः।।
ऋ. २.६.५
तर्जः परिकथे तिल राजकुमारा
दिव्य वृष्टि बरसाने वाले, तृसित धरा को तू सरसा (2)
झुलसी जा रही ताप से भूमि, कृष्ण मेघ जल को बरसा ॥
॥ दिव्य ॥
ग्रीष्म ताप से तरसी धरती (2) ताल तलैया सूख रहे हैं, (2)
मेघों बीच बिजुरिया कौंधी (2) वर्षा जल लाये आतुरता॥
॥ झुलसी ॥
प्रसन्नता की लहर आ रही, कृषकों में उमंग छा रही, (2)
अन्न वनस्पति औषधियों में (2) आये नजर प्रभु कृतार्थता ॥
॥ झुलसी ॥
वही प्रभु आत्मा के भीतर, (2) आनन्द वर्षा करते रहते (2)
ज्ञानेन्द्रिय मन आत्म-प्राणों को (2) वृष्टि से पुलकित करता।
॥ झुलसी ॥
आतंकवाद भी ताण्डव करता (2) गोलियाँ खाते हैं निर्दोष।
किसने अहिंसा से पैदा की शक्ति विलक्षण, निर्भयता ॥
॥ झुलसी ॥
एक बीज से पौधा निकले (2) कितने दाने उसमें उपजे (2)
कौन है? शाक फलों की उपज में, अत अपनी लीलाएं करता।
॥ झुलसी ॥
आओ अग्नि स्वरूप प्रभु की (2) नतमस्तक हो महिमा गायें (2)
उसके उज्ज्वल कृत्यों को कर (2) पायें जीवन में प्रवरता ॥
॥ झुलसी ॥
(घरा) धरती, (कृष्ण मेघ) काले बादल, (आतुरता) व्यग्रता। (कृषक) किसान। (कृतार्थता)
सफलता, दक्षता। (पुलकित) रोमाञ्चित, हर्ष युक्त। (विलक्षण) अद्भुत (कृत्य) किये
जाने वाले कर्तव्यकर्म (प्रवरता) श्रेष्ठता।










