भगवन् तेरे चरणों में दो दिन तो रहे होते
और वेद के सागर में जी भर के बहे होते ॥
स्वार्थ न लोभ होता सन्तोष में ही जीते
और भाव कुटिलता के मन में न लिए होते ॥ भगवन् तेरे..
न वैर द्वेष करते ना दुश्मनी में ढलते
इससे तो बेहतर था होठों को सिए होते ॥ भगवन् तेरे…
जीते हुए क्या जीते दुःख दर्द से सहमे दिल
मजबूर वेबसों के आँसू ही पिए होते ॥ भगवन् तेरे…
इससे तो मौत अच्छी अपने लिए जो जीते
जीने का तब मजा हे परहित में जिए होते ॥ भगवन् तेरे…
सागर भरे हुए हैं रत्नों से मोतियों से
कुछ ज्ञान के ये मोती हमने भी चुने होते ॥ भगवन् ते…
ईश्वर तेरी लगन में सब जन्म मेरे बीते
मन में यही अभिलाषा क्या जागते क्या सोते ॥ भगवन् तेरे..
तर्ज: प्रीतम तेरी दुनियाँ में










