यस्त॑ इ॒ध्मं ज॒भर॑त्सिष्विदानो मूर्धानं वा तृतर्पते त्वाया।
भवस्तस्य स्वतवाँः पायुरग्ने विश्वस्मात्सीमुघायत उरुष्य ॥ ऋः ४.२.६
तर्जः मोली मोली कातिरुन्दर गणी कोरमग-राग-भूपाली
मेरा मेरा में ही भरा हुआ स्वार्थ है
समझे जो ‘इनन्नमम्’ निस्वार्थ है
लाए जो समिधाएँ प्रभु के लिए
ऐसे तपी को श्रयण प्राप्त है
होता कभी ना याज्ञिक निराश्रय
प्रभु से रक्षित सदा सर्वदा निर्भय
हृदय में उसके, प्रयत प्रकाश है (2)
॥ मेरा मेरा ॥
ऐश्वर्य प्राकृतिक, जीवों को अर्पित
सुख के हेतु, प्रभु ने दिया है,
स्थूल या सूक्ष्म या अणु-परमाणु में
निज स्वार्थ प्रभु का अपगम रहा है,
जीव पाए भोग या भोग छोड़ मोक्ष
प्रभु-दया-जीव का पुरुषार्थ है (2)
॥ मेरा मेरा ॥
जीव के कर्मो के हेतु मानो
नये नये संसार रचता है
कर्त्तव्य-भ्रष्ट भोगी जीव को प्रभु
कर्त्तव्य-पथ पे ला सकता है
हर बार जीव को चेताता है प्रभु
उसके हर कार्य में परमार्थ है (2)।
॥ मेरा मेरा॥
भगवत-प्रीत वही कर सकता है
जिसमें दान की क्षमता है
जिसके दान में भाव निष्काम के
मिलती उसे प्रभु-ममता है
‘तेरा तुझको सौंप दिया प्रभु!
हे महादानी, तेरे अनुयात हैं॥ (2)
(समिया) प्रकाशित होने वाला इंधन। (इदन्नमम्) ये मेरा नहीं है। (श्रयण) आश्रय, शरण। (प्रवत)
पवित्र, शुद्ध। (अपागम) दूर रहना, हट जाना। (अनुयात) अनुगामी, पीछे-पीछे चलने वाला।
























