अव॑ ते हेळो वरुण नमौभि॒िरव॑ य॒ज्ञेभिरीमहे हृविर्भिः ।
क्षय॑न॒स्मभ्यम॑सुर प्रचेता॒ राज॒त्रेनासि शिश्रथः कृतानिं ॥14॥ ऋ. १.२४.१४
तर्जः मालवून टाकदीप-484/490
आ प्रभु से बाँध प्रीत, पाश काटता वो मीत
वो दिखाये सही दिशा, सत्य जगाये, हरे अलीक॥
प्रभु के क्रोध से बचें, है इसी के तीन उपाय
नमस्कार यज्ञ हवि, ये जीवन के तीन मीत
॥ वो दिखाये ॥
उसकी महिमा के आगे, हों श्रद्धा से नतमस्तक
जिससे भागे अहंकार, हो हृदय प्रतत पुनीत ॥ वो दिखाये ॥
कर्म करें यज्ञमय, हानिरहित, करें उपकार
देवपूजा संगतिकरण, दान दीप का प्रदीप
॥वो दिखाये ॥
होवे जीवन हवि स्वरूप, तुच्छ स्वार्थता से दूर
परोपकार परायण, अनूप, त्यागशील भाव नीक ॥ वो दिखाये॥
राजाधिराज हैं वरुण, घट-घट वासी धर्म निपुण
दूर करते हैं अनिष्ट, हैं प्रचेता गुण गुणीश
॥वो दिखाये ॥
हे मेरे प्यारे आत्मन्, यज्ञमन करो जीवन
करके हविर्मय हृदय ले आनन्द घन आशीश
॥वो दिखाये ॥
(अलीक) झूठ असत्य। (प्रतत) विस्तृत। (अनूप) अनुपम, सुन्दर। (प्रचूर) अत्यधिक।
(प्रगुण्य) सम्यक् ज्ञान रखने। (प्रदीप) प्रकाश।










