भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनगिनत वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिनमें से कई गुमनाम रह गए। बसंत कुमार बिस्वास ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे, जिनका योगदान अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष में अविस्मरणीय है।
उनके बलिदान दिवस (11 मई) पर उन्हें स्मरण करना प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी का कर्तव्य है।
प्रारंभिक जीवन एवं क्रांतिकारी यात्रा
बसंत कुमार बिस्वास का जन्म 6 फरवरी 1895 को पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के पोरागाछा गाँव में हुआ था। वे एक साधारण परिवार में जन्मे थे, लेकिन उनकी अंगों में देशभक्ति का रक्त प्रवाहित हो रहा था। प्रारंभ से ही वे अन्याय और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध थे।
उनकी क्रांतिकारी यात्रा तब आरंभ हुई जब वे बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों अमरेन्द्रनाथ चटर्जी एवं रासबिहारी बोस के संपर्क में आए। इन महान स्वतंत्रता सेनानियों के विचारों से प्रेरित होकर वे ‘युगांतर’ नामक क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गए और शीघ्र ही इसकी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।


दिल्ली में बम हमला: अंग्रेजी शासन को हिलाने वाला साहसिक कृत्य
1911 में जब ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया, तब इस अवसर को भव्य बनाने के लिए विभिन्न समारोह आयोजित किए गए। यह अवसर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांति की चिंगारी सुलगाने के लिए उपयुक्त था।
रासबिहारी बोस के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाई, जिससे न केवल अंग्रेजी हुकूमत को चेतावनी दी जा सके बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की भावना को और अधिक तेज किया जा सके। योजना के तहत, 23 दिसंबर 1912 को बसंत कुमार बिस्वास ने एक स्त्री का वेश धारण कर वायसराय के जुलूस में बम फेंका। दुर्भाग्यवश, वायसराय हार्डिंग बच गया, लेकिन इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को झकझोर कर रख दिया।
ब्रिटिश लेखक और इतिहासकार वैलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक “इंडिया अनरेस्ट” में इस घटना को भारतीय क्रांति का एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने लिखा कि इस हमले से स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा मिली और इससे प्रेरित होकर कई युवाओं ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध शस्त्र उठाने का निर्णय लिया।
गिरफ्तारी और अदालती षड्यंत्र
इस साहसिक हमले के बाद अंग्रेजी सरकार बौखला गई और दिल्ली-लाहौर षड़यंत्र केस के अंतर्गत सभी संदिग्धों को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया। लेकिन बसंत कुमार पुलिस की पकड़ से बचते रहे।
हालांकि, 26 दिसंबर 1914 को जब वे अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अपने गाँव गए, तब अंग्रेजी सरकार के जासूसों ने उन्हें पहचान लिया और गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उन पर दिल्ली में मुकदमा चलाया गया, और 5 अक्टूबर 1914 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
लेकिन अंग्रेजी हुकूमत इतने पर संतुष्ट नहीं थी। वे क्रांतिकारियों को कड़ा संदेश देना चाहते थे, ताकि भविष्य में कोई उनके खिलाफ आवाज न उठा सके। इसके लिए अंग्रेजों ने लाहौर उच्च न्यायालय में अपील की और मुकदमे से जुड़े दस्तावेजों में हेराफेरी कर उनकी उम्र को दो साल अधिक दिखाया। इस छलपूर्ण कार्यवाही का उद्देश्य उन्हें नाबालिग होने के कारण सजा से बचने का कोई अवसर न देना था।
बलिदान और अमरत्व
अंग्रेजी सरकार की अपील सफल रही और बसंत कुमार बिस्वास को फांसी की सजा सुना दी गई। 11 मई 1915 को उन्हें अम्बाला जेल में फांसी दे दी गई। इस प्रकार, मात्र 20 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी और भारत माता के लिए बलिदान हो गए।
उनका बलिदान केवल एक व्यक्ति का बलिदान नहीं था, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस ज्वाला को प्रज्वलित करने वाला था, जिसने बाद में लाखों भारतीयों को क्रांति की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।
उपसंहार
बसंत कुमार बिस्वास जैसे वीर क्रांतिकारी आज भी हमारे हृदयों में जीवित हैं। दुर्भाग्यवश, आधुनिक भारत में ऐसे बलिदानियों को अपेक्षित सम्मान और स्मरण नहीं मिलता। हमें उनके बलिदान को न केवल याद रखना चाहिए, बल्कि उनकी देशभक्ति से प्रेरणा लेकर राष्ट्र की सेवा में योगदान देना चाहिए।
आज, जब हम स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, तब हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह स्वतंत्रता हमें उन वीर बलिदानियों के त्याग और संघर्ष के कारण मिली है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी।
शत-शत नमन क्रांतिधर्मा बसंत कुमार बिस्वास को!
विस्तृत जीवन परिचय

कल 11 मई को क्रांतिधर्मा बसंत कुमार विश्वास का बलिदान दिवस था पर दुखद कि हम में से किसी ने उन्हें याद नहीं किया। 6 फरवरी 1895 को पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के पोरागाछा गाँव में एक साधारण परिवार में जन्में बंसत कुमार बिस्वास उस समय के प्रसिद्द क्रान्तिधर्माओं अमरेन्द्रनाथ चटर्जी एवं रास बिहारी बोस के प्रभाव में आकर प्रसिद्द क्रांतिकारी संगठन युगांतर में शामिल हो गए और शीघ्र ही संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।
रासबिहारी बोस के निर्देश पर संगठन ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किये जाने के उपलक्ष्य में हो रहे समारोहों के अंतर्गत तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग के जुलूस में बम फेंककर उसे मारने और अंग्रेजी सरकार के मन में भय उत्पन्न करने का निश्चय किया। संगठन के निर्देशानुसार बंसत कुमार ने 23 दिसंबर 1912 को एक स्त्री का वेश बनाकर हार्डिंग पर बम फेंका परन्तु क्रांतिकारियों के दुर्भाग्य से वो बच गया। पर इस घटना ने अंग्रेजी सरकार को हिला कर रख दिया।
इस घटना के प्रभाव के बारे में अपनी पुस्तक इंडिया अनरेस्ट में चर्चा करते हुए प्रसिद्द अंग्रेजी विचारक और इतिहासकार वैलेंटाइन शिरोल ने लिखा है कि नयी राजधानी में प्रवेश के अवसर पर निकाली जा रही शोभायात्रा में वायसराय पर बम फेंकना निश्चय ही क्रांतिकारियों का एक बहुत बड़ा कदम था, जो तात्कालिक तौर पर भले ही असफल हो गया पर इसने आगे के लिए क्रान्ति का रास्ता तय कर दिया और इस कृत्य से प्रेरणा ले कितने ही युवाओं ने इसी तरह के कितने ही दुस्साहस किये।
अंग्रेजी सरकार ने इस घटना, जिसे दिल्ली लाहौर षड़यंत्र कहा गया, के आरोपियों को पकड़ने के लिए दिन रात एक कर दिए परन्तु बंसत कुमार घटनास्थल से फरार होने के बाद पुलिस की पकड़ में नहीं आये। परन्तु 26 दिसंबर 1914 को उन्हें उस समय उनके पैतृक गाँव से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपने पिता का अंतिम संस्कार कर रहे थे। 23 मई 1914 से उन पर दिल्ली में मुकदमा चलाया गया और इसी वर्ष 5 अक्टूबर को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी। परन्तु अंग्रेजी सरकार इससे संतुष्ट नहीं थी क्योंकि वो क्रांतिकारियों के दिलों में डर उत्पन्न करने के लिए बसंत कुमार को फांसी देना चाहती थी। अपने इरादों को मूर्त रूप देने के लिये सरकार ने लाहौर उच्च न्यायालय में अपील की और इसी बीच पंजाब की अम्बाला जेल में मुक़दमे से सम्बंधित रिकार्ड्स में छेड़छाड़ कर उनकी आयु को वास्तविक आयु से 2 वर्ष अधिक दिखा दिया, ताकि उन पर उनके कार्यों का पूरा उत्तरदायित्व डाला जा सके और उन्हें किसी भी प्रकार से बचने का अवसर ना मिले। इस कुकृत्य से सरकार मुकदमा जीत गयी और बंसत कुमार को फांसी की सजा सुना दी गयी। 11 मई 1915 को उन्हें अम्बाला जेल में फांसी पर लटका दिया गया और इस प्रकार भारतमाता के ये पुत्र चिरनिद्रा में लीन हो गया। उन्हें शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि ।
~ सभार : विशाल अग्रवाल










