शीवतस्ते पुरुशाक् शाका । गामिव स्रुतयः संचर॑णीः ।
व॒त्सानां न त॒न्तय॑स्त इन्द्र दाम॑न्वन्तो अदामानः सुदामन् ।। ऋः ६.२४.४
तर्जः मानस मिलये पुन्नोऽन्गळ
राग-भीमपलासी
हे जगदीश्वर ! तुम ‘पुरुशाक’ हो, हो सर्वशक्तिमान (2)
प्रज्ञा और क्रिया दोनों में रहते सदा विद्यमान (2)
हे जगदीश्वर…
होती हैं दूध की धारें संचरित जैसे इन गौओं के थनों से
वैसे प्रभु की पोषण और कल्याण की शक्तियाँ बरसें युगों से
बाँधा प्रभु ने हमें नियमों में जिससे बनें ऋतवान (2)
हे जगदीश्वर
नियमों के बन्धन हैं हितकारक करते हमें बलवान सदा ही
सत्य के नियम हैं अतिसुखकारक, इनमें बसे भगवान मेधावी
आओ प्राप्त करें प्रभु-शक्तियाँ बनें कर्मशील प्रज्ञावान (2)
हे जगदीश्वर …
ध सां सां सां सां सां सां सां सां नी प
प नी प नी नी नी नी नी नी नी सां नी प नी
रे ग रे ग सा, नी सारे नी सां ऽऽऽ (अंतरा)
(‘पुरुशाक’) बहुत शक्तिवाला। (ऋतवान्) नियमानुसार चलने वाला। (मेघावी) बुद्धिमान ।
(प्रज्ञावान) उत्तम बुद्धि से युक्त।










