बालुकण वर्षा की बूंदे

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बालुकण वर्षा की बूंदे

तर्ज – बेशक मन्दिर मस्ज़िद तोड़ो बुल्लेशाह यह कहता

बालुकण वर्षा की बूंदे,
ये आकाश के तारे ।
उपकार दयानन्द ऋषि के लोगों,
गिन सकता न कोई सारे ।
घर घर में थी फिर जहालत
सबके दिल पर वही छा गया ।
इक निराला वेदों वाला ऋषि आ गया ……

वह ऋषि आ गया जी,
वह ऋषि आ गया जी ।
हां वह ऋषि आ गया जी,
आ गया ऋषि आ गया । ।
इक निराला वेदों वाला ऋषि आ गया …..

वैदिक धर्म तजा दुनियां ने,
और मज़हब लाख बनाए ।
आर्य जाति पड़ी सदियों,
से मुरदा कौम कहाए ।
तभी जान में जान आ गई,
ऐसा बढ़िया गीत गा गया ।
इक निराला वेदों वाला ऋषि आ गया …..

भारत वर्ष गुलामी वाला,
कब से था बोझ उठाए ।
आगे बढ़कर उस योगी,
ने बन्धन तोड़ गिराए ।
और सामने जो भी आया,
नतमस्तक होकर चला गया ।
इक निराला वेदों वाला ऋषि आ गया …..

कितनी बार घने संकट के,
बादल थे घिर घिर आए ।
टंकारा के ब्रह्मचारी ने,
मार के फूंक उड़ाए ।
लगे काँगपने सभी विरोधी
’पथिक’ ज़माना डगमगा गया।
इक निराला वेदों वाला ऋषि आ गया …..