आशा हरती धीरज को और ज़रा रूप को हारता है।

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आशा हरती धीरज को और ज़रा रूप को हारता है।


आशा हरती धीरज को,
और ज़रा रूप को हारता है।
नीच करे उत्पाद सदा,
और दूर धर्म को करता है।
कामी लज्जा त्याग करे,
और कष्ट अनेकों भरता है।
“धर्मी”धारण करे शील को,
देश धर्म हित मरता है।

“धर्मी”सभा,सभा नहीं होती,
जिसमें कोई विद्वान नहीं।
“धर्मी”वह विद्वान नहीं,
जो करे धर्म का गान नहीं।
“धर्मी”धर्म नहीं है जिसमें,
सत्य का शुभ स्थान नहीं।
“धर्मी”सत्य नहीं होता जो,
छल से रहित बखान नहीं।

मत नदियों का पता लगाओ,
कहां से कैसे बहती है।
पर त्रियों से बात करो ना,
दुख सुख कैसे सहती है।
उन संतों का कुल ना पूछो,
जिनमें श्रद्धा रहती है।
“धर्मवीर”इसमें ही हित है,
नीति ऐसे कहती है।

मित्र नहीं वह शत्रु हैं,
जो मिलकर संग में घात करें।
मीठा बनाकर भेद पूछ लें,
समय पड़े उत्पात करें।
“धर्मी”वो ही मित्र कहावें,
दु:ख में भी जो साथ करें।
खान-पान पहरान एक हों,
सदा एक सी बात करें।