आर्यवीर सुखराम जी

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जन्म और परिवार
आर्यवीर सुखराम जी का जन्म हरियाणा प्रान्त के भिवानी जिले के दूधवा ग्राम में एक सम्पन्न किसान परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम श्री रामजीलाल था। इनके दो भाई – भगवानसिंह आर्य और श्री सुलतानसिंह आर्य – तथा दो बहनें थीं। बचपन से ही इन पर आर्य समाज का गहरा प्रभाव था। वे सत्यार्थ प्रकाश का गहन अध्ययन करते और गाँव के लोगों को भी सुनाया करते थे। आर्य समाज के सिद्धान्तों का इन्हें अच्छा ज्ञान था और वे समाज में वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करते रहते थे।

आर्य समाज सेवा
सुखराम जी विवाह एवं अन्य संस्कार वैदिक पद्धति से कराते थे और संस्कारों के समय प्रभावशाली व्याख्यान देकर लोगों को आर्य सिद्धान्तों की प्रेरणा देते थे। वे नये-नये आर्य समाज स्थापित करने हेतु हवन, जनेऊ संस्कार आदि कराते रहते थे।
उन दिनों प्रसिद्ध आर्य उपदेशक स्वामी केवलानन्द जी (इकतारे वाले भजनोपदेशक), श्री घारीसिंह आर्य तथा दादा वस्तीराम जी जैसे महापुरुष समय-समय पर हरियाणा क्षेत्र में प्रचार के लिए आते थे। सुखराम जी पर विशेषतः दादा वस्तीराम जी का गहरा प्रभाव पड़ा और वे उनके प्रिय शिष्य व सहयोगी बन गए।

वीरगति की घटना (1942 ई.)
सुखराम जी के सामाजिक कार्य और लोकप्रियता के कारण कई विरोधी भी उत्पन्न हो गए थे। दिसम्बर 1942 की एक रात कुछ डाकुओं ने दूधवा गाँव में हमला किया। वे शस्त्रों से लैस थे और उनकी योजना विशेष रूप से सुखराम जी को समाप्त करने की थी।
उस समय सुखराम जी अपने ग्राम के बनिये श्री फूलचन्द की दुकान पर हिसाब कर रहे थे। डाकुओं ने अचानक घेरा डाल लिया और गोलियां चलानी शुरू कर दीं। सुखराम जी ने भागकर बचने का प्रयास किया, लेकिन निर्दयी डाकुओं ने पीछा करते हुए उन पर गोली चला दी। गोलियां सीधी लगीं और यह वीर युवा उसी क्षण वीरगति को प्राप्त हो गया।

डाकुओं से मुठभेड़ और बदला
घटना की सूचना शीघ्र ही गाँव-गाँव फैल गई। सुखराम जी के मित्र चौ० ललतीराम आर्य ने तुरंत कार्यवाही की। उन्होंने कुशल खोजियों – मायाराम ब्राह्मण, मामचन्द, हरसुख और कुब्जा – को साथ लेकर डाकुओं का पीछा किया। केवल लाठियों से लैस ये वीर छः डाकुओं के पीछे लगे और डालनवास पहाड़ के पास उन्हें घेर लिया।
भीषण मुठभेड़ हुई। चौ० ललतीराम आर्य और उनके साथियों ने वीरता दिखाते हुए एक डाकू को मौके पर ही मार गिराया, तीन को घायल कर पकड़ा तथा लूट का सामान और हथियार छीन लिये। दो डाकू भाग निकले, पर बाद में पकड़े गये। मुकदमा दादरी अदालत और जीन्द हाईकोर्ट में चला, जिसके परिणामस्वरूप एक डाकू को संगरूर में फाँसी दी गई।

सुखराम जी की स्मृति और योगदान
भरी जवानी में इस आर्यवीर का बलिदान पूरे हरियाणा और आर्य समाज के लिए गहरा आघात था। आर्य समाजियों को उनका निधन असहनीय दुःख पहुँचा गया। यद्यपि चौ० ललतीराम आर्य ने तत्काल प्रतिशोध लेकर उनके रक्त का बदला लिया, किन्तु सुखराम जी के स्थान की पूर्ति कभी न हो सकी।
यदि वे जीवित रहते तो हरियाणा और देश में आर्य समाज का प्रचार और भी व्यापक रूप से करते। उनका परिवार आज भी आर्य समाज के कार्य में सहयोग देता रहा है।

प्रार्थना
ईश्वर से प्रार्थना है कि आर्यवीर सुखराम जी का परिवार निरंतर फले-फूले और आर्य समाज के महान कार्य में सदैव योगदान करता रहे। उनका बलिदान हमें यह संदेश देता है कि सच्चे आर्य समाजी अपने प्राणों की आहुति देकर भी धर्म और समाज की रक्षा के लिए अडिग रहते हैं।