आर्यवीर श्री मेघराज जी

0
13

जन्म और पृष्ठभूमि

श्री मेघराज जी का जीवन उन पुरुषों का जीवन है जिन्होंने अपनी उन्नति स्वयं की है। उन्होंने किसी विद्यालय में शिक्षा नहीं पाई, बल्कि घर का काम-काज संभालते हुए अपने अनवरत उद्योग से असाधारण योग्यता प्राप्त की।
काव्योपयोगी हिन्दी का उन्हें अच्छा अभ्यास था। वे संस्कृत, गुजराती, मराठी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषा जानते थे तथा कुछ प्रान्तीय भाषाओं में भी दक्ष थे।
रामायण, गीता, प्रेमसागर और पुराणों का गहन अध्ययन उनके ज्ञानकोष का हिस्सा था। उनका स्वभाव मिलनसार, मृदुभाषी, हंसमुख और विनोदप्रिय था।


आत्मिक खोज और मोड़

श्री मेघराज जी नारायणगढ़ (होल्कर राज्य) के निवासी थे। उनका जन्म संवत् 1938 में जाट घराने में हुआ।
पौराणिक संस्कारों में पले-बढ़े होने के बावजूद, युवावस्था में वे आत्मिक शांति की खोज में भटकते रहे। तभी उनके जीवन की नाव को सही दिशा मिली — यह दिशा दिखाने वाले थे श्री विनायकराव।


विनायकराव का प्रभाव

श्री विनायकराव उन प्रारंभिक आर्यपुरुषों में से थे जिनके हृदय में महर्षि दयानन्द के पावन उद्देश्य की ज्वाला सदा प्रज्वलित रहती थी।
वे बिना किसी आदेश या सभा की प्रतीक्षा किए स्वयं उपदेशक, भजनीक और वेदप्रचारक के रूप में सक्रिय रहते थे।
नारायणगढ़ पहुँचकर उन्होंने निडरता से महर्षि दयानन्द का संदेश प्रचारित किया। पौराणिक पंडितों में खलबली मच गई, जनता में हलचल उत्पन्न हो गई। कट्टरपंथियों ने उन पर ईंट-पत्थर बरसाए, किंतु उन्होंने धैर्य से सहा।


मेघराज जी का वैदिक मार्ग में प्रवेश

मेघराज जी इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी थे। पौराणिकों के अनुचित आचरण से उनका हृदय विद्रोह से भर उठा। उन्होंने विनायकराव जी को अपने घर लाकर सेवा की और वार्तालाप में महर्षि दयानन्द कृत ग्रंथों एवं वैदिक सिद्धांतों का अध्ययन प्रारंभ किया।
धीरे-धीरे वे स्वयं इस विषय के विद्वान बने और अपने उपदेशों से अनेक लोगों को लाभान्वित किया।


व्यक्तित्व और कार्यशैली

श्री मेघराज जी सादा जीवन और उच्च विचार के प्रतीक थे। वे परिश्रमी, धर्मप्रचार में निष्ठावान और किसानों की सुविधा का ध्यान रखने वाले थे।
अक्सर वे कोसों पैदल चलकर प्रचार के लिए जाते, ग्रस्तों और अनाथों को बचाते और धाराप्रवाह बोलते थे। लेखन में भी दक्ष थे — उनकी पुस्तक ‘मानवहित’ उनके जीवनकाल में प्रकाशित हुई।


सामाजिक चेतना और साहस

सन् 1938 में इंदौर नरेश द्वारा अछूतों के मंदिर प्रवेश की घोषणा हुई। कट्टरपंथियों ने इसका विरोध कर अछूतों को धमकाया।
तब मेघराज जी ने घोषणा की —
“यद्यपि मैं मूर्तिपूजा का घोर विरोधी हूँ, तथापि यदि आप अपने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए मंदिर प्रवेश करना चाहेंगे तो मैं अग्रणी होकर आपके कार्य में सहयोग दूँगा।”


बलिदान

राम नवमी के दिन, कार्यवश जंगल में गए मेघराज जी पर सात सशस्त्र व्यक्तियों ने घेरकर क्रूर आक्रमण किया। गंभीर रूप से घायल अवस्था में भी उन्होंने कहा —
“मुझे अपनी इस स्थिति पर तनिक भी खेद नहीं है। भगवान भूलों को सुपथ बतावें और आर्यजाति का कल्याण हो।”
इसके बाद उन्होंने आँखें मूँद लीं और सदा के लिए अमर हो गए।


न्याय और स्मृति

उस समय नारायणगढ़ की राजनीतिक परिस्थिति बिगड़ी हुई थी। आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान ने इस हत्या की गंभीरता से जाँच करवाई और अपराधियों को दंड दिलवाया।
श्री मेघराज जी द्वारा स्थापित 12 समाज आज भी उनके त्याग और सेवा के प्रतीक हैं।


निष्कर्ष

श्री मेघराज जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि सच्चा धर्म सेवा, सत्य और साहस में है।
ओ३म् — देव पुनः ऐसे धर्मवीर, सेवाप्रेमी, आदर्शजन उत्पन्न करें।