आर्य समाज मंदिर, औरैया का 113वां वार्षिकोत्सव – वैदिक संस्कृति का भव्य आयोजन
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” – इस वैदिक उद्घोष के साथ आर्य समाज अपने सत्य, धर्म और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सतत कार्यरत है। इसी श्रृंखला में आर्य समाज मंदिर, औरैया का 113वां वार्षिकोत्सव भव्य रूप से मनाया जा रहा है। यह आयोजन 19 मार्च 2025 (बुधवार) से 23 मार्च 2025 (रविवार) तक चलेगा, जिसमें वेदों के ज्ञान, यज्ञ, भजन-कीर्तन और वैदिक उपदेशों से वातावरण को पवित्र किया जाएगा।
कार्यक्रम का उद्देश्य
इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य विश्वशांति एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन है। समाज में वैदिक मूल्यों को स्थापित करने, धार्मिक ज्ञान बढ़ाने और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने हेतु यह एक अद्वितीय अवसर होगा।
कार्यक्रम स्थल एवं तिथियां
स्थान: आर्य समाज मंदिर, दिबियापुर मार्ग, औरैया,(उ०प्र०)
दिनांक एवं समय:
19 मार्च से 23 मार्च 2025 तक, प्रतिदिन तीन सत्रों में कार्यक्रम होंगे:
- प्रातः 8:00 – 10:30: यज्ञ, भजन एवं वेदोपदेश
- दोपहर 3:00 – 5:30: विद्वानों से शंका समाधान
- सायं 7:30 – 10:00: भजन एवं उपदेश

कार्यक्रम विवरण
- 19 मार्च: यज्ञ, ध्वजारोहण, शोभायात्रा, भजन एवं उपदेश
- 20 मार्च – 22 मार्च: यज्ञ, भजन, वेदोपदेश एवं विद्वानों से शंका समाधान
- 23 मार्च: समापन दिवस – विशेष यज्ञ, भजन एवं प्रवचन
विशिष्ट वैदिक विद्वान एवं उपदेशक
इस अवसर पर देशभर के प्रसिद्ध वैदिक विद्वान अपने विचार प्रस्तुत करेंगे:
- पं. नरेश दत्त आर्य (भजनोपदेशक, बिजनौर)
- डॉ. आयुषी राणा “भारती” (स्नातिका, कन्या गुरुकुल, नजीबाबाद)
- पं. उमेश चंद्र कुलश्रेष्ठ (महोपदेशक, आगरा)
आर्य समाज क्यों आएं?
यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक वैचारिक जागरण है। यहां आने से आपको मिलेगा:
- सत्य सनातन वैदिक धर्म का ज्ञान
- जीवन को उन्नत बनाने वाले वैदिक सिद्धांत
- ईश्वर, आत्मा, धर्म, कर्म, यज्ञ, पुण्य-पाप पर गहन चर्चा
- श्रेष्ठ नागरिक बनने की प्रेरणा
- वैदिक ग्रंथों का अध्ययन एवं उनकी वैज्ञानिकता की समझ

आयोजन समिति एवं संपर्क सूत्र
प्रधान: श्रीमती अंजना गुप्ता (9557474925)
कोषाध्यक्ष: कृष्ण कुमार दुबे (9458021877)
मंत्री: देवेश चंद्र आर्य (8279819038)
समस्त आर्य समाज परिवार, औरैया इस महायज्ञ में आप सभी श्रद्धालुजनों का हृदय से स्वागत करता है। आइए, इस पवित्र आयोजन का हिस्सा बनें और वैदिक संस्कृति की अलख जगाएं।
“यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।”
(यज्ञ, दान और तप का त्याग नहीं करना चाहिए, ये तीनों कर्म बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।)
ओ३म्
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