आर्य प्रतिनिधि सभा दुर्ग के तत्वावधान में 35 दिव्यांग जोड़ों का वैदिक विवाह सम्पन्न:छत्तीसगढ़

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Arya pratinidhi Sabha Durg

रायपुर, छत्तीसगढ़ (17 फरवरी)

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक अद्वितीय सामाजिक पहल के तहत 35 दिव्यांग जोड़ों का वैदिक विवाह सम्पन्न हुआ। इस आयोजन का संयुक्त रूप से संचालन आर्य प्रतिनिधि सभा दुर्ग, अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद (छत्तीसगढ़ प्रांत), कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज, मारवाड़ी युवा मंच रायपुर सेन्ट्रल और सीनियर सिटीजन वेलफेयर फोरम द्वारा किया गया।

वैदिक रीति-रिवाज से सम्पन्न हुआ विवाह

यह भव्य समारोह आशीर्वाद भवन, बैरन बाजार, रायपुर में आयोजित किया गया, जिसमें दिव्यांग युवक-युवतियों का विवाह वैदिक विधि-विधान से संपन्न हुआ। विवाह संस्कार के ब्रह्मा आचार्य विश्वामित्र आर्य दर्शनाचार्य (इंदौर, म.प्र.) ने संपूर्ण विधि का संचालन किया, जबकि जगबन्धु शास्त्री के संयोजन में कार्यक्रम को संपन्न किया गया।

आचार्य विश्वामित्र आर्य ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय धर्मशास्त्रों और कानून में दिव्यांग जनों को भी विवाह का मूल अधिकार प्राप्त है। विवाह संस्कार व्यक्ति को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कराकर समाज और सृष्टि के संचालन का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। इस अवसर पर आचार्य शुशील स्वामी, गजराज शास्त्री और महर्षि दयानंद आश्रम (टाटीबंध, रायपुर) के ब्रह्मचारी भी उपस्थित रहे और उन्होंने पूरे आयोजन में सहयोग दिया।

Arya pratinidhi Sabha Durg

मुख्यमंत्री सहित कई गणमान्य अतिथि रहे उपस्थित

दिव्यांग नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद देने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, कई समाजसेवी और गणमान्य अतिथि इस आयोजन में शामिल हुए। उन्होंने इस पुनीत कार्य के लिए आयोजकों की सराहना की और नवविवाहित जोड़ों को शुभकामनाएं दीं।

समाज के लिए प्रेरणादायक पहल

इस आयोजन ने समाज में दिव्यांग व्यक्तियों की स्वीकृति और उनके अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। यह विवाह समारोह न केवल दिव्यांग जनों को समान अवसर देने की पहल थी, बल्कि भारतीय संस्कृति में निहित वैदिक परंपराओं को संरक्षित और प्रचारित करने का भी प्रयास था।

इस अवसर पर नवविवाहित जोड़ों को उपहार और आवश्यक वस्तुएं भेंट की गईं, जिससे उनका गृहस्थ जीवन सुखद और सुगम हो सके। आयोजकों ने भविष्य में भी इस तरह के सामाजिक कार्यक्रमों को जारी रखने का संकल्प लिया।


यह आयोजन न केवल विवाह संस्कार का एक पवित्र अवसर था, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा भी बना कि दिव्यांगता किसी भी व्यक्ति के वैवाहिक अधिकारों और खुशहाल जीवन की राह में बाधा नहीं हो सकती।

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