अर्पण है तन मन धन,स्वागत स्वीकार करो।
अर्पण है तन मन धन,
स्वागत स्वीकार करो।
यह तुच्छ भेंट मेरी,
इसे अंगीकार करो॥ टेक ॥
- यह शीतल मन्द पवन,
इठलाती लहराती।
मन की विचलित तड़पन,
प्राणों में बस जाती।
विस्तृत जो नील गगन,
ऐसा स्वीकार करो।
अर्पण है तन….।
शुभ आपके आने से
यह धन्य हुई धरती।
2.ऋतुराज बने हो तुम
स्वागत जनता करती।
है धन्य धरा तुमसे इसका
उद्धार करो।
अर्पण है तन….।
मन में और प्राणों में
कर श्रद्धा की कलियों।
हम आर्यवीर हरदम लेकर
शुभ नावलियाँ।
अभिनन्दन करते हैं
इसके मल्हार करो।
अर्पण है तन….।










