प्र हिन्यानो जनिता रोदस्यो, रथो न वाज १ सनिपन्नयासीत् ।
इन्द्रं गच्छन्नायुधा स शिशानो विश्वा वसु हस्तयो रादधानः ॥
साम. ५३६ ऋग. ७.७०.१
तर्जः ये हौसला कैसे झुके, ये आरजू…
ये वीर तो कैसे झुकें, युद्ध-स्थली में वो तो डटें,
वीरता भर आएगी, मुश्किल टल जाएगी
हिम्मत बढ़ जाएगी ॥ हो SSS
व्याकुल भूख से दीन रहते, अन्न छकड़ों पे वो टूट पड़ते
सुस्तों को पृथ्वी पे भोग दिखे, पर वीर संग्राम इससे लड़ें
बाँटें जीवन सामग्री, बन सैनिक अग्रणी
जीवन करते विजयी ॥ हो ऽऽऽ
उनके हथियारों में पूर्ण विवेक, सत्य अहिंसा पे चलना ही है
संयम-दया का लगा अभिषेक, वीरों का माथा चमकना ही है
भावना जग जाएगी, मेहनत रंग लाएगी
ज्योतियाँ बढ़ जाएँगी ॥ हो 55
पृथ्वी आकाश को देखें अगर, नक्शे कदम उनके चलना ही है
युद्ध से मेघ-विजुरियाँ भरें, फेनिल लहर को उमड़ना ही है
नदियाँ चट्टानों से युद्धकर आगे बढ़े, युद्धकर आगे बढ़े
साय सॉय पवन करे ॥ हो ऽऽऽ
वीर को संयम सदाचार से, भार भोगों का दलना ही है
जर्जित-जवान क्या रक्षा करें ?
खुद वो निहत्था कंगला ही है
जीने का तब मज़ा, जीवन भर युद्ध लड़ा
विजयी सेहरा बँधा ॥ हो ऽऽऽ
वीर वो सच्चा जाए जिधर, स्फूर्ती सबों में भरना ही है
निर्वल दीन दुःखी है अगर, दुःख कष्ट उनके हरना ही है
करुणा रंग लाएगी, ग्लानियाँ दल जाएँगी
सुबहा फिर आएगी ॥ हो ऽऽऽ










