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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गाथा अनगिनत वीर क्रांतिकारियों के त्याग, साहस और बलिदान से रची गई है।
इनमें से एक अनमोल नाम है अनंत लक्ष्मण कान्हेरे, जिन्होंने मात्र 18 वर्ष की उम्र में अपना जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान कर दिया। उनका साहस और निस्वार्थ समर्पण आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
अनंत लक्ष्मण कान्हेरे का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के खेड़ तालुका के अयानी गाँव में हुआ था। साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे अनंत बचपन से ही मेधावी और तेजस्वी बालक थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा निज़ामाबाद और उच्च शिक्षा औरंगाबाद में प्राप्त की। बचपन से ही उन्हें पढ़ने-लिखने का अत्यधिक शौक था। किशोरावस्था में उन्होंने ‘मित्र प्रेम’ नामक उपन्यास भी लिखा, जो उनकी साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण है।
औरंगाबाद में रहते हुए अनंत का संपर्क गुप्त क्रांतिकारी संगठनों से हुआ। उनकी राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता को इन संगठनों ने और प्रबल बना दिया। मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जन वायली की हत्या ने उनके मन में भी एक ऐसे ही अन्यायी अधिकारी को दंडित करने का विचार जन्म दिया।
ब्रिटिश अत्याचार और जैक्सन की क्रूरता
उस समय महाराष्ट्र ब्रिटिश शासन के विरोध में अग्रणी था। नासिक में क्रांतिकारी संगठन अभिनव भारत और अन्ना कर्वे की गुप्त समिति स्वतंत्रता संग्राम के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही थीं। इन्हीं के संपर्क में आने के बाद अनंत ने मातृभूमि के लिए अपना जीवन समर्पित करने का निश्चय किया।
नासिक का तत्कालीन कलेक्टर जैक्सन अपने आपको भारतीयों का हितैषी दिखाने का ढोंग करता था, लेकिन वास्तविकता में वह अंग्रेजी साम्राज्य का कठोर और अन्यायी अधिकारी था। उसने बाबाराव सावरकर और वामन सखाराम खरे जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया। जैक्सन के इन क्रूर कार्यों ने क्रांतिकारियों के सब्र का बाँध तोड़ दिया।
जैक्सन की हत्या की योजना
अन्ना कर्वे और उनकी समिति ने 1910 में जैक्सन को मारने की योजना बनाई। 21 दिसंबर 1909 को जैक्सन के सम्मान में नासिक के विजयानंद थिएटर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ मराठी नाटक ‘शारदा’ का मंचन होना था। अनंत कान्हेरे ने इस मौके का फायदा उठाकर जैक्सन को मारने का संकल्प लिया।
अनंत ने वीर सावरकर द्वारा भेजे गए रिवॉल्वर से जैक्सन के सीने में चार गोलियाँ दाग दीं। जैक्सन वहीं ढेर हो गया। लेकिन अनंत को तुरंत पकड़ लिया गया, जिससे उन्हें आत्महत्या करने का मौका नहीं मिला।
मुकदमा और बलिदान
अनंत पर मुंबई की अदालत में मुकदमा चलाया गया। 19 अप्रैल 1910 को उन्हें थाणे जेल में फांसी दी गई। उनके साथ-साथ अन्ना कर्वे और विनायक देशपांडे को भी फांसी दे दी गई। इन क्रांतिकारियों के शव परिवार को सौंपने के बजाय जेल अधिकारियों ने जला दिए और अवशेष समुद्र में बहा दिए।
अनंत कान्हेरे की स्मृति
आज अनंत कान्हेरे की स्मृति में नासिक के एक चौक का नाम अनंत कान्हेरे चौक और एक मैदान का नाम अनंत कान्हेरे मैदान रखा गया है। यह स्थान उनके साहस और बलिदान की गाथा को जीवित रखते हैं।
बलिदान का संदेश
अनंत कान्हेरे का बलिदान न केवल ब्रिटिश शासन के क्रूर चेहरे को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि स्वतंत्रता के लिए भारतीय युवाओं ने किस तरह अपने प्राणों की आहुति दी। अनंत के जीवन का हर पहलू हमें सिखाता है कि जब देश और धर्म पर आंच आए, तो युवा पीढ़ी को आगे आकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए।
उनके बलिदान दिवस पर यह गाथा हर भारतीय को उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अवसर है। अनंत लक्ष्मण कान्हेरे को शत-शत नमन।
(साथ में दिया चित्र तब का है जब जैक्सन की हत्या के बाद अनंत जी को पकड़ने पर पुलिस ने उन्हें रस्सियों से जकड़ कर उनकी परेड कराई थी |)
लेखक : विशाल अग्रवाल
चित्र : माधुरी










