अनमोल है जीवन तो फिर इसको गवाँ नहीं

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अनमोल है जीवन तो फिर इसको गवाँ नहीं

जब तक हैं प्राण तन में प्रभु को भुला नहीं ॥

मन में क्यूँ मोह माया है और क्यों है राग द्वेष

गर आत्मा मलीन है तो क्या जीवन में शेष ?

संयम में रह तू विषयों में मन को लगा नहीं ॥ जब तक है…

कर्मों की बाज़ी जीत के पाया मानुष जनम

जीवन बना तू ऐसे के छूटे जनम मरण

आनन्द मुक्ति का मिले, प्रभु के सिवा नहीं ॥ जब तक है…

जीवन प्रकाश शक्ति का ईश्वर है आत्मरूप

दुष्टों का रुद्ररूप है शिष्टों का सुखस्वरूप

प्रभुहीन जो हृदय हैं उनमें दिव्यता नहीं ॥ जब तक है..

पावन है गंगा ज्ञान की ओर स्रोत तुम प्रभु

लहरें उठा हृदय में हे ! ज्ञान के सिन्धु

वो मन क्या जिसमें ज्ञान का दीपक जला नहीं ॥ जब तक है…

जिनके हृदय पवित्र हैं उनके हृदय में तुम

और दूर उस हृदय से जिसमें भरे दुर्गुण

पाना है पूज्य प्रभु को तो पापों में जा नहीं ॥ जब तक है…

(रुद्ररूप) दंड स्वरूप (दिव्यता) बड़प्पन

तर्ज: लग जा गले के फिर ये हस