अम्बिका चक्रवर्ती: एक वीर क्रांतिकारी का जीवन परिचय

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1. परिचय

अम्बिका चक्रवर्ती भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे, जिन्होंने मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में चटगांव शस्त्रागार कांड (1930) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एक साहसी सेनानी थे, जिन्होंने आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। स्वतंत्रता के बाद, वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और शोषित वर्ग के उत्थान के लिए कार्य किया।


2. जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

  • जन्म: 1892 ई.
  • पिता का नाम: नंदकुमार चक्रवर्ती
  • जन्म स्थान: बंगाल (ब्रिटिश भारत)
  • शिक्षा: बाल्यकाल से ही क्रांतिकारी विचारधारा की ओर झुकाव था।
  • प्रभावित व्यक्ति: मास्टर सूर्यसेन (मास्टर दा)

अम्बिका चक्रवर्ती ने अपने विद्यार्थी जीवन में ही देश की स्वतंत्रता के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। अहिंसात्मक आंदोलन को वे प्रभावहीन मानते थे, इसलिए उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना।


3. क्रांतिकारी गतिविधियाँ

3.1 चटगांव शस्त्रागार कांड (18 अप्रैल 1930)

मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में चटगांव क्रांतिकारी दल ने अंग्रेजों के शस्त्रागार पर हमला किया। इस दल में शामिल अन्य प्रमुख क्रांतिकारी थे:

  • आनंद गुप्ता
  • अर्धेन्दु दस्तीदार
  • अनंत सिंह
  • कल्पना दत्त
  • प्रीतिलता वाडेदार
  • शशांक दत्त
  • नरेश राय
  • निर्मल सेन
  • जीबन घोषाल
  • तारकेश्वर दस्तीदार
  • सुबोध राय
  • हरगोपाल बल
  • लोकनाथ बल
  • गणेश घोष

अम्बिका चक्रवर्ती की भूमिका:

  • संचार व्यवस्थाओं को नष्ट करने का कार्य किया ताकि अंग्रेजी प्रशासन सूचना आदान-प्रदान न कर सके।
  • रणनीतिक योजनाओं को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • अंग्रेजों के हथियार और गोला-बारूद पर कब्जा करने में सहायता की।

3.2 जलालाबाद की मुठभेड़ (22 अप्रैल 1930)

  • इस मुठभेड़ में अम्बिका चक्रवर्ती गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन बचने में सफल रहे।
  • कुछ महीनों बाद उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

4. गिरफ्तारी, सजा और कारावास

  • उन पर “सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने” का मुकदमा चलाया गया।
  • पहले फांसी की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में आजन्म कारावास में बदल दिया गया।
  • उन्हें अंडमान निकोबार स्थित काला पानी (सेल्युलर जेल) भेज दिया गया।
  • 1946 तक वे जेल में ही रहे।

5. स्वतंत्रता के बाद का जीवन

  • 1946 में जेल से रिहा हुए।
  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) में शामिल हुए।
  • 1952 में बंगाल विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।
  • उन्होंने पीड़ित और शोषित समुदायों की आवाज उठाई और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

6. मृत्यु

  • मृत्यु तिथि: 6 मार्च 1962
  • स्थान: कोलकाता (सड़क दुर्घटना में निधन)

अम्बिका चक्रवर्ती का निधन एक दुखद घटना थी, लेकिन उनका बलिदान और योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सदैव स्मरणीय रहेगा।


7. निष्कर्ष

अम्बिका चक्रवर्ती एक महान क्रांतिकारी, निडर स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी थे। उनका जीवन राष्ट्र के प्रति त्याग और समर्पण की प्रेरणा देता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।

“देश के लिए जीना और मरना ही सच्चे देशभक्त की पहचान होती है।”

चटगाँव शस्त्रागार पर हमला कर अंग्रेजी सरकार को नाको चने चबाने के लिए मजबूर करने वाले क्रांतिकारियों के दल में से एक प्रसिद्द क्रांतिकारी अम्बिका चक्रवर्ती का जन्म 1892 में नन्दकुमार चक्रवर्ती के यहाँ हुआ था। वे अपने विद्यालयी जीवन से ही देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के बारे में सोचने लगे थे। कांग्रेस के अहिंसात्मक आन्दोलन को वो कायरता का दूसरा नाम समझते थे और इसीलिए उनका झुकाव सशस्त्र क्रान्ति की तरफ हो गया।शीघ्र ही उनका जुड़ाव चटगाँव में क्रान्ति की पाठशाला और भारतीय क्रांतिकारी आकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र मास्टर सूर्यसेन उपाख्य मास्टर दा से हो गया जिसके बाद अम्बिका चक्रवर्ती के जीवन में क्रांतिपथ का राही बनने के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा शेष रही ही नहीं। अंग्रेजी सरकार की चूलें हिलाने के लिए मास्टर दा ने अपने साथियों के साथ चटगाँव शस्त्रागार पर आक्रमण करने की एक ऐसी योजना बनायीं जिसके बारे में सोचकर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

तय योजना के अनुसार 18 अप्रैल 1930 को मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में आनंद गुप्ता, अर्धेन्दु दस्तीदार, अनंत सिंह, कल्पना दत्त, प्रीतिलता वाडेदार, शशांक दत्त, नरेश राय, निर्मल सेन, जीबन घोषाल, तारकेश्वर दस्तीदार, सुबोध राय, हरगोपाल बल, लोकनाथ बल, गणेश घोष एवं अम्बिका चक्रवर्ती आदि ने चटगाँव शस्त्रागार पर आक्रमण किया। मास्टर दा के निर्देश पर अम्बिका चक्रवर्ती ने अपने कुछ साथियों के साथ उस पूरे इलाके की संचार व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ताकी अंग्रेजी प्रशासन को सूचनाओं के आदान प्रदान में कठिनाइयों का सामना करना पड़े और इस स्थिति का लाभ उठाकर क्रांतिकारी अपनी स्थिति को मजबूत कर सकें।

22 अप्रैल 1930 को जलालाबाद में अंग्रेजी पुलिस के साथ हुयी एक मुठभेड़ में वे बुरी तरह से घायल हो गए पर बच निकलने में कामयाब रहे। परन्तु कुछ माह बाद पुलिस ने उनके छिपने के स्थान को खोज निकाला और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का मुकदमा चलाकर फांसी की सजा सुना दी गयी, जिसे बाद में आजन्म कारवास में बदल कर उन्हें कालापानी की सजा भुगतने के लिए अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जहाँ वो 1946 तक कैद रहे। 1946 में अपनी मुक्ति के पश्चात अम्बिका चक्रवर्ती कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और शोषित वर्ग के लिए कार्य करने लगे। 1952 में हुए चुनाव में वे बंगाल विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए और विधानसभा में पीड़ित-शोषित समुदाय की आवाज के रूप में पहचाने गए। 6 मार्च 1962 को उनका कलकत्ता में एक सड़क दुर्घटना में दुखद निधन हो गया पर हमारे हृदयों में वे सदैव् जीवित रहेंगे।

कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि!